My mother and wandering डिमेंशिया और माँ का भटकना

शुरू शुरू में जान-पहचान के लोग इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे कि मेरी माँ को कुछ दिक्कतें हो रही हैं, क्योंकि माँ अपनी दिक्कतों को छुपा पाती थीं. कभी कभी अगर कुछ कंफ्यूज़ भी हो जाती थीं, तो बात बदल देती थीं. चौबीस घंटे साथ रहने वालों को तो साफ पता चलता था कि उनमें काफी बदलाव है, पर दस पन्द्रह मिनट के लिए मिलने वालों को तो वे सामान्य ही दिखती थीं.

इसका नतीजा यह था कि उन्हें माँ से वैसी ही उम्मीद होती थी जैसे कि सालों पहले थी. और वे सोचते थे कि माँ की देखभाल भी वैसे ही होनी चाहिए जैसे अन्य बुजुर्गों की.

माँ के कमरे का एक दरवाजा सीधे घर के बाहर के कॉरिडोर में खुलता था. जब बाहर कोई चल रहा होता था या लोग आपस में बात करते हुए गुजारते थे, तो माँ अक्सर सोचती थीं कि कोई उन्हें बुला रहा है या कोई मिलने वाला आ रहा है. वे तुरंत उठकर दरवाजा खोलकर बाहर निकल जातीं. बाहर जाने के बाद कोई नज़र नहीं आता तो वे भूल जातीं कि किसलिए निकली थीं और इधर उधर टहलने लगतीं. गर्मी में धूप में, लू में घूमती रहतीं. सर्दी में बिना गरम कपड़ों के निकल जातीं. वे यह भूल जातीं कि उनका संतुलन ठीक नहीं था, और बिना किसी सहायता के सीढ़ियों से उतरने की कोशिश करतीं.

मुझे बहुत सतर्क रहना पड़ता था. दरवाजा खुलने की आवाज़ सुनते ही मैं भागती कि कहीं बाहर जाकर सीढ़ियों पर गिर न जाएँ, लू न लग जाए, ठंड न लग जाए. उन्हें बहला कर धीरे से वापस अंदर लाती. कभी कभी तो वे खुशी खुशी वापस आ जातीं, कभी जिद्द करतीं कि जरूर कोई मिलने आया था. मुझसे नाराज़ होने लगतीं कि मैं उन्हें लोगों से मिलने नहीं दे रही.

मैं समझाती कि कोई मिलने आएगा तो घंटी बजाएगा, ऐसे बिना मिले थोड़े ही चला जाएगा, आपको इतनी जल्दी दरवाजा खोलने की जरूरत नहीं है. मैं खोल दूंगी, आप क्यों परेशान होती हैं! वे कभी कभी समझ जातीं और मान भी लेतीं, पर फिर जब आवाज़ सुनतीं तो दरवाजे की तरफ लपकतीं. मैं अंदर से चटकनी लगाती तब भी वे उसे तेजी से खोल कर निकल जातीं. काफी बार हादसे होते होते बचे. एक दो बार उन्हें लू लग गयी और वे बीमार पड़ गयीं. मैं क्या करती? और नहीं सूझा तो मजबूरन मैंने उनके दरवाजे में अंदर से ताला लगाना शुरू कर दिया, यह बहाना बनाकर कि शहर में खून खराबे के वारदात बहुत बढ़ गए हैं, और बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए यह पुलिस का सुझाव है.

माँ तो शायद मान जातीं, पर जान पहचान वाले उन्हें उकसाने लगे. वे कहने लगे, आपकी बेटी ने तो आपको कैद कर रखा है, आप यह कैसे बर्दाश्त कर रही हैं. हम तो अपने बच्चों से ऐसी पाबंदी मंजूर नहीं करते. आप जब मर्जी जहाँ मर्जी बेझिझक जाइए, बेटी की बात मत सुनिए. वे मुझे भी डांटते, कहते तुम अपनी माँ को तंग कर रही हो.

मैंने उन लोगों को बताया कि माँ को डिमेंशिया है और वे भटक सकती हैं और खो सकती हैं. यह भी बताया कि माँ कैसे एक दो बार सीढ़ियों पर लुढ़कने वाली थीं. पर वे यही सोचते कि मैं बहाने बना रही हूँ या झूठ बोल रही हूँ. कहते यह डिमेंशिया विमेंशिया कुछ नहीं है, तुम्हारी माँ बिलकुल ठीक-ठाक हैं. तुम्हारा माँ के साथ सलूक गलत है.

इस उकसाने के कारण माँ मुझसे नाराज़ रहने लगीं. एक दिन मौका पा कर घर से फिर निकल गयीं, इस इरादे से कि वे अकेली बाजार जायेंगी. निकलने के बाद वे कुछ घबरा गयीं. सीढ़ियों के पास एक लड़का खड़ा था, उन्होंने उससे कहा कि उन्हें नीचे जाना है. लड़के ने उनकी मदद कर दी. फिर उन्होंने एक रिक्शा वाले को संकेत किया और कहा उन्हें बाजार जाना है. मुझे यह सब मालूम नहीं था. मैंने जब देखा माँ कमरे में नहीं हैं, तो ढूंढ़ना शुरू किया. यह तो शुक्र है कि एक जान-पहचान वाले ने देखा कि माँ अकेली हैं और घबराई हुई लग रही हैं, और उन्हें वापस ले आया, वरना तो यह सोच के दिल दहलता है कि क्या हो सकता था.

इस हादसे के बाद भी माँ के हमउम्र दोस्त यह मानने को तैयार नहीं थे कि माँ को कोई ऐसी तकलीफ थी जिससे उन्हें कंफ्यूशन रहता था, और उनकी सलाह माँ के लिए अनुचित थी. उनका उकसाना जारी रहा.

आखिरकार मैंने माँ के लिए दिन भर साथ रहने वाली एक आया को रखा, जो उनको साथ भी देती थी और यह भी ध्यान रख पाती थी कि माँ खुद को नुकसान न पहुचाएं. मैंने अन्य भी कुछ तरीके अपनाए जिनसे उनके भटकने की प्रवृत्ति कुछ कम हुई. यदि वे कंफ्यूशन के मारे बाहर निकलने की कोशिश करती तो भी हम उन्हें समय पर रोक पाते थे.

डिमेंशिया में भटकने की समस्या आम है, और अधिकाँश डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति में पायी जाती है. इस कारण मैंने इस विषय पर अपने सुझाव एक वीडियो में रिकार्ड करे हैं. शायद यह वीडियो आपके या आपके किसी जान-पहचान वाले के काम आये:

(यदि वीडियो प्लेयर नीचे लोड नहीं होता, तो आप इसे यूट्यूब पर यहाँ देख सकते हैं.

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