विश्व अल्ज़ाइमर दिवस 2015 के अवसर पर डिमेंशिया देखभाल पर कुछ विचार

दुनिया भर में सितम्बर का महीना “विश्व अल्ज़ाइमर माह” (World Alzheimer’s Month) के रूप में मनाया जाता है, और सितम्बर 21 “विश्व अल्ज़ाइमर दिवस” (World Alzheimer’s Day) के रूप में मनाया जाता है. (अल्जाइमर रोग डिमेंशिया के लक्षण पैदा करने वाले रोगों में मुख्य है). इस महीने विशेषज्ञ और स्वयंसेवक अनेक कार्यक्रमों द्वारा डिमेंशिया और संबंधित देखभाल के बारे में जानकारी फैलाने का खास प्रयत्न करते हैं. अखबारों और पत्रिकाओं में भी डिमेंशिया पर लेख प्रकाशित होते हैं. इस ब्लॉग पोस्ट द्वारा मैं भी डिमेंशिया देखभाल के बारे में कुछ बांटना चाहती हूँ.

यदि आप डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं तो आप शायद अन्य देखभाल करने वाले परिवारों के अनुभव जानना चाहते होंगे. आप यह जानना चाहते होंगे कि आपके प्रियजन को किस प्रकार की समस्याएँ हो सकती है, देखभाल के क्या तरीके हैं, लोग तनाव से कैसे बचते हैं, देखभाल की योजना कैसे बनाते हैं.

यूं समझिए, डिमेंशिया देखभाल एक सालों लंबा सफर है. परिवार वालों को व्यक्ति की समस्याएं समझने में समय लगता है. स्थिति स्वीकारने में, और उचित सहायता के तरीके ढूंढ़ने में और बदलाव करने में टाइम लगता है, मेहनत करनी पड़ती है. गलतियों होती हैं, निराशा होती है, एक दूसरे पर गुस्सा आता है. धीरे धीरे हालत सुधरने लगती है और परिवार वाले सोचते हैं कि शुक्र है, अब तो सब ठीक-ठाक चलने लगा है. फिर व्यक्ति का डिमेंशिया कुछ नई समस्या पैदा कर देता है, हालत और बिगड़ जाती है. परिवार वालों को समझने और तरीके ढूंढ़ने का सिलसिला फिर शुरू करना पड़ता है. देखभाल के इस सफर में उतार-चढ़ाव होते ही रहते हैं. और हर परिवार में स्थिति और उपाय अलग होते हैं.

अन्य परिवारों के देखभाल संबंधी अनुभव जानने से फायदा हो सकता है, पर ऐसे अनुभव जान पाना आसान नहीं है.

किसी देखभाल कर्ता से पूछें कि देखभाल करने का आपका अनुभव क्या है, तो वे वही कहेंगे जो उन्हें उस पल याद आता है, और जो वे बेझिझक बाँट सकते हैं. सालों-साल चलने वाले डिमेंशिया का निचोड़ यकायक चंद वाक्य में कोई कैसे दे! स्वाभाविक है कि कई लोग हाल में हुई घटनाओं पर या अभी हो रही समस्याओं पर बात करेंगे. एक महीने बाद यदि आप उन से फिर पूछें, तो वे शायद उस घटना का जिक्र ही न करें, या किसी नई समस्या के बारे में बात करें, जो अब उन्हें परेशान कर रही है. डिमेंशिया किस अवस्था में है, परिवार का अनुभव इस पर निर्भर है. डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति शुरूआती अवस्था में हो तो परिवार वाले कुछ कहेंगे, और अंतिम अवस्था हो तो कुछ और कहेंगे.

शर्म और झिझक अनुभव बांटने में बाधा पैदा करते हैं. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो लोग दूसरों को इसलिए नहीं बताएँगे क्योंकि उन्हें शर्म आती है, या उन्हें लगता है कि सुनने वाले उनकी निंदा करेंगे या उन्हें हीन या नालायक समझेंगे. खुल कर लोग तभी बात कर पाते हैं जब कि माहौल उन्हें सुरक्षित लगे और उन्हें भरोसा हो कि कोई उनकी बात लेकर उनकी निंदा नहीं करेगा.

सब परिवारों के अनुभव अलग होते हैं. यदि यह जानना हो कि डिमेंशिया में किस किस तरह के अनुभव हो सकते है तो कई लोगों से बात करनी होगी. सिर्फ एक या दो प्रकाशित लेखों को पढ़कर आपको सही और पूरी जानकारी नहीं मिल सकती. ये लेख कुछ परिवारों के कुछ अनुभव प्रस्तुत करते हैं. लेख आपके लिए कितना उपयोगी है यह इस पर निर्भर है कि रिपोर्टर ने किस इरादे से लेख लिखा है. और लेख में जो पेश है वह सिर्फ एक झलक है, क्योंकि रिपोर्टर ने तो सिर्फ कुछ परिवार चुने हैं, और उनकी बातों से सिर्फ वे कुछ अंश चुने हैं जो लेख में फिट हो रहे थे. वैसे भी कई लोग इंटरव्यू में खुल कर नहीं बोलते. शायद आप के लिए जिन देखभाल करने वालों के अनुभव उपयोगी हो सकते थे उनका इंटरव्यू न हुआ हो. शायद लेख में जो प्रस्तुत है वह अंश आपके मतलब का न हो, या आपको गलत जानकारी दे.

यदि आपको डिमेंशिया के अनुभवों के बारे में ठीक से जानकारी चाहिए तो आपको अनेक परिवारों की कहानियाँ जाननी होंगे. लेख, किताबें, ब्लॉग पढ़ने होंगे. अन्य देखभाल करने वालों से बात करनी होगी. अपनी कहानी बांटनी होगे, और दूसरों की कहानी सुननी होगी. समर्थक समुदाय में भाग लेना होगा. जितने ज्यादा परिवार वाले आपस में खुल कर बात करें, उतना ही अच्छा होगा. समुदाय के तौर पर हम सभी एक दूसरे की मदद कर सकते हैं, समर्थन दे सकते हैं.

मैं भी कई साल तक देखभाल कर्ता रह चुकी हूँ. अपने निजी अनुभव से मैं जानती हूँ कि डिमेंशिया और देखभाल के सफर में उचित जानकारी से देखभाल आसान और कारगर हो सकती है, और तनाव और अकेलापन भी कम हो जाता है. दूसरों के किस्से सुनने से मुझे माँ के डिमेंशिया को स्वीकारने में आसानी हुई थी, और उपयोगी सुझाव भी मिले थे. मैंने भी अपने अनुभव खुल कर ब्लॉग और वीडियो द्वारा बांटे हैं. और अपने डिमेंशिया वेबसाइट पर मैंने अनेक देखभाल करने वालों के विस्तृत इंटरव्यू प्रकाशित करे हैं. अखबारों में और अन्य ब्लॉग और साईट पर उपलब्ध देखभाल की कहानियों के लिंक भी एकत्रित करे हैं. डिमेंशिया देखभाल के क्षेत्र में यह मेरा एक योगदान है. कुछ लिंक:

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2 thoughts on “विश्व अल्ज़ाइमर दिवस 2015 के अवसर पर डिमेंशिया देखभाल पर कुछ विचार

  1. SS

    नमस्ते
    मैंने अपने अनुभव पर आधारित दो लघु कथाएं लिखी हैं. उनमें से एक मैं यहाँ बाँट रहा हूँ.

    *** शीर्षक- स्पर्श/ट्यूनिंग/अनुकूलन ***
    {डिमेन्शिया/अल्ज़ाइमर्स मरीज़ों को समर्पित }
    [* विश्व अल्ज़ाइमर्स दिवस *21 सितम्बर पर विशेष *]

    कैसा लगता होगा उस प्रौढ़ को जो बूढ़ा होने से पहले ही कई साल बिस्तर पर पड़े रहने को मज़बूर हो जाये। काम करने की इच्छा तो हो, लेकिन हाथ-पैर सुचारु रूप से न चलें। बोलने की इच्छा हो, तो सही शब्द चयन नहीं हो पाता। स्वस्थ कानों से सुनाई सब कुछ दे रहा है लेकिन दिमाग़ प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहा। स्वस्थ नैत्रों से दिखाई सब दे रहा लेकिन भ्रमित/क्षतिग्रस्त दिमाग़ कुछ और देख रहा हो।

    अपनों को तक भुला देने वाली बीमारी- “डिमेन्शिया (मतिभ्रम/मतिक्षय)” – के विचित्र लक्षणों से पीड़ित बिस्तर पर सात सालों से पड़ी ऐसी ही एक मरीज़ के पलंग के सिरहाने पर खड़ा एक बेटा उसके सिर पर अपना हाथ फेर रहा था। केवल उसी बेटे के साथ माँ की सही ट्यनिंग कुछ सालों से बनी हुई थी। उसी की नम्रता और नरम स्पर्श ही माँ को भला लगता था।बेटे को भी लगता था कि इससे ही माँ के साथ भावनाओं का पारस्परिक संप्रेषण हो पा रहा है। माँ ने अपनी मुट्ठी कस कर बेटे के हाथ को थाम रखा था। उनकी आँखें एक धार्मिक तस्वीर पर टिकी हुई सी…पथराई सी….किसी अनहोनी का ही संकेत दे रहीं थीं।

    तभी कक्ष में कुछ कड़क पुरुष स्वर गूंजे।”….ये होना चाहिए था…वो होना चाहिए था….ये नहीं किया….वो नहीं किया…..।” तमाम टिप्पणियों के चलते शिक्षित बहुयें अपने बच्चों को ट्यूशन सेन्टर भेजने को बाध्य कर रहीं थीं।एक दया दृष्टि दादी माँ पर डाल कर भारी मन से, कुछ बेमन से अपने भारी बस्ते उठा कर बच्चे चले ही गये ट्यूशन के लिये।

    वह बेटा अभी भी कभी अपनी माँ के सिर को सहलाकर, तो कभी स्पर्श से स्नेह बरसा रहा था। ….और फिर…कुछ ही पलों में तीन-चार बहुत लम्बी सी सांसों के साथ ही…सिर हिला हिलाकर किसी अपने को तलाश करती माँ की आँखें एकदम स्थिर हो गयीं।

    प्राण जा चुके थे। महिलाओं का, बाकी बेटों का पारस्परिक विलाप शुरू हो गया था।असहाय पति वहीं चहलकदमी कर रहे थे । बिना रोये….बिना एक आँसू बहाये वह बेटा माँ के सिर पर और चेहरे पर नरम हाथ फेर रहा था अभी भी पूरे विश्वास और आशा के साथ कि माँ की आँखों की पुतलियां अभी फिर से हिलेंगी…. उसे स्नेह से देखते हुये।

  2. SS

    मेरे अनुभव पर आधारित मेरी दूसरी लघु कथा:

    ** शीर्षक- “इच्छा शक्ति” **

    जी हाँ, नैत्रा अभ्यस्त हो चुकी थी। अपनी भारी-भरकम, लम्बे क़द की प्रौढ़ माँ को भोजन कराना, स्नान कराना,व्हील चेयर पर बिठाकर बालकनी पर, पूजा कक्ष में ले जाना और दवायें समय पर देना, सब कुछ अद्भुत इच्छा शक्ति के दम पर वह कर लेती थी। पिताजी के आकस्मिक देहांत के बाद औसत क़द की तीस वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएट नैत्रा को दस वर्षों से अकेले यह सब करते देखकर किरायेदार और रिश्तेदार हैरान हो जाते थे और कहा करते थे कि बेटे से अच्छी सेवा तो ये बेटी कर लेती है।

    हद तो तब हो गई जब आयुर्वेद के कुछ नुस्खों से माता जी के स्वास्थ्य लाभ के लिये उसने दो गायें पाल लीं। उनकी भी देखरेख के साथ रोज़ाना एक गाय को नीचे के कक्ष से ज़ीने (सीढ़ियों) से चढ़ाकर अपनी माँ के कक्ष तक वह ले जाती थी किसी प्राकृतिक चिकित्सा के संदर्भ में।

    एक दिन लेखक ने यह सब दिनचर्या स्वयं देखी , तो दंग रह गया । सेवा निवृत्त शििक्षका माँ डिमेन्शिया [मतिक्षय/ मतिभ्रम] के लक्षणों से पीड़ित होने के कारण दस सालों से बिस्तर पर थीं। माँ अपने इकलौते बेटे रतन को प्रोफेसर बनाना चाहती थीं।माँ के सपने पूरे करना नैत्रा के लिये एक बड़ी चुनौती थी। सो उसने होनहार भाई को कोटा की कोचिंग में अध्ययन करने भेज दिया था।

    पड़ोसियों, रिश्तेदारों का दवाब पड़ने पर भी उसने विवाह नहीं किया। माँ से शास्त्रीय संगीत की जो शिक्षा मिली थी, उसी से घर पर ही संगीत की कक्षा लगाकर वह दिल बहला लेती थी।

    लेखक ने जब नैत्रा की मदद करनी चाही तो बड़ी विनम्रता से उसने कहा-“आप बस मम्मी के सामने बैठ कर कुछ बोलते रहियेेगा, उन्हें लगता है कि उनका ही बेटा बोल रहा है।

    विदा लेते समय जब लेखक ने कहा – “अगर माताजी को अच्छा लगे तो कभी कभी मैं आ सकता हूँ, मैं अपनी माँ की कोई सेवा नहीं कर पाया था…..।”

    यह सुनकर उस सज्जन युवती ने आँखें नीचे कर लीं। उसका चेहरा एकदम से उदास सा हो गया।

    “नहीं,रहनेदीजिए..। किरायेदारों, पड़ोसियों….यहाँ तक कि रिश्तेदारों को भी मेरे परिचित पुरुषों का भी यहाँ आना पसंद नहीं है।”

    यह सुनकर एक साथ कई “चुनौतियों” पर ‘कथानक’ और ‘कथा वस्तु’ लेकर लेखक वहां से बस चल पड़ा।

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