Category Archives: भारत में डिमेंशिया (मनोभ्रंश) और देखभाल पर चर्चा

पार्किंसन रोग और डिमेंशिया (Parkinson’s Disease and Dementia)

हम में से कई लोगों ने पार्किंसन रोग (Parkinson’s Disease) से ग्रस्त लोगों को देखा है, और हम जानते हैं कि पार्किंसन एक गंभीर समस्या है. दवा से इस में पूरा आराम नहीं मिल पाता, और व्यक्ति की स्थिति समय के साथ खराब होती जाती है. पर आम तौर पर हम पार्किंसन रोग के सिर्फ कुछ मुख्य शारीरिक लक्षण जानते हैं —  हम यह नहीं जानते हैं कि इस में अनेक दूसरे प्रकार के लक्षण भी होते हैं. ये भी समय के साथ साथ बिगड़ते जाते हैं, और अनेक तरह से व्यक्ति के जीवन में बाधा डालते हैं. व्यक्ति सामान्य जीवन नहीं बिता पाते. एक चिंताजनक पहलू है पार्किंसन और डिमेंशिया (मनोभ्रंश, dementia) के बीच का सम्बन्ध: पार्किंसन वाले व्यक्तियों में से कई व्यक्तियों को डिमेंशिया भी हो जाता है.

parkinson man

पार्किंसन रोग मस्तिष्क के कुछ भागों में विकार के कारण होता है. इसकी खास पहचान वाले लक्षण हैं: कंपन (ट्रेमर), जकड़न, काम करने में धीमापन, गति में बदलाव, शारीरिक संतुलन (बैलैंस) में दिक्कत. इस रोग को अकसर मोटर डिसॉर्डर या मूवमेंट डिसॉर्डर भी कहा जाता है (हरकत में विकार).

पार्किंसन के ऐसे भी कई लक्षण हैं जिन का चलने फिरने या हरकत से सम्बन्ध नहीं है. उदाहरण- मूड के विकार, ध्यान लगाने में समस्या, योजना न बना पाना, याददाश्त की समस्या, दृष्टि भ्रम, पेशाब करने में दिक्कत, सूंघने की काबिलियत खो देना, नींद में समस्या, वगैरह.

पार्किंसन रोग एक प्रगतिशील विकार हैं. इस के अधिकाँश केस बड़ी उम्र के लोगों में होते हैं, पर यह कम उम्र में भी हो सकता है. इसके लक्षण समय के साथ बिगड़ते जाते हैं. चलने फिरने और शरीर पर नियंत्रण रख पाने की समस्याएँ बहुत गंभीर हो जाती हैं. इस के अलावा अन्य लक्षण भी ज्यादा बढ़ जाते हैं जैसे कि शरीर में दर्द, थकान, और रक्तचाप कम होना. निगलने में दिक्कत होने लगती है, और सही मात्रा में जल और पौष्टिक खाना देना मुश्किल हो जाता है. अग्रिम अवस्था में पार्किंसन से ग्रस्त व्यक्ति डिमेंशिया और डिप्रेशन के शिकार भी हो सकते हैं.

पार्किंसन और डिमेंशिया के बीच का सम्बन्ध चिंताजनक है, क्योंकि दोनों ही बहुत गंभीर रोग हैं. कुछ अनुमान के अनुसार करीब एक-तिहाई पार्किंसन रोगियों को डिमेंशिया होगा. इसे पार्किन्संस रोग डिमेंशिया (Parkinson’s Disease Dementia) कहते हैं.

पार्किंसन रोग और डिमेंशिया के बीच एक दूसरा सम्बन्ध भी है. कुछ प्रकार के डिमेंशिया में व्यक्ति में पर्किन्सोनिस्म (पार्किन्सन किस्म के लक्षण) भी हो सकता है. “डिमेंशिया विथ लुइ बॉडीज” (Dementia with Lewy Bodies) नामक डिमेंशिया में यह लक्षण आम हैं: अनुमान है की इस प्रकार के डिमेंशिया में करीब दो-तिहाई लोगों में हरकत की समस्याएँ होंगी.

lewy body in neuron

अब तक के शोध से यह पता चला है कि पार्किंसन रोग में और लुइ बॉडी डिमेंशिया में मस्तिष्क में हुए बदलाव में समानता है—दोनों में मस्तिष्क की कोशिकाओं (मस्तिष्क के सेल) में एक असामान्य संरचना, “लुइ बॉडी”, पायी जाती है. “लुइ बॉडी” की उपस्थिति के महत्त्व को समझने की कोशिश जारी है. कुछ विशेषज्ञों का विचार है कि “पार्किन्संस रोग डिमेंशिया” और  “डिमेंशिया विथ लुइ बॉडीज” मस्तिष्क में एक खास प्रोटीन से संबंधित एक विकार के दो अलग रूप हैं. इन दोनों में अग्रिम अवस्था में लक्षण और भी सामान होते जाते हैं.

वर्तमान रोग-निदान प्रणाली के हिसाब से “पार्किन्संस रोग डिमेंशिया” और  “डिमेंशिया विथ लुइ बॉडीज”, दोनों एक श्रेणी (“लुइ बॉडी डिमेंशिया”, Lewy Body Dementia) के अंतर्गत दो अलग रोग-निदान हैं. कौन से लक्षण किस क्रम में होते हैं, रोग-निदान में इस्तेमाल नाम उस पर निर्भर है. यह नाम मिलते जुलते हैं, और कुछ डॉक्टर कभी किसी नाम का इस्तेमाल करते हैं, कभी किसी दूसरे नाम का. परिवारों के लिए यह काफी कन्फ्यूजन पैदा करता है.

परिवार वालों को इस बात से कोई खास वास्ता नहीं है कि मस्तिष्क के सेल में क्या नुकसान हो रहा है, या  विशेषज्ञ किस नाम पर सहमत होंगे. वे यह जानना चाहते हैं कि व्यक्ति को किस किस तरह की दिक्कतें हो सकती हैं, किस तरह के उपचार संभव हैं, और देखभाल कैसे करनी होगी. इस के लिए पार्किंसंस रोग और डिमेंशिया के बीच के सम्बन्ध पर कुछ मुख्य तथ्य :

  • पार्किंसन रोगी के केस में: यदि किसी को पार्किंसन रोग है, तो आम-तौर से पहचाने जाने वाले शारीरिक पार्किंसन किस्म के लक्षणों के अलावा व्यक्ति में दूसरे लक्षण भी होते हैं. व्यक्ति में डिमेंशिया पैदा होने की  ऊंची संभावना है.
  • डिमेंशिया के लक्षण होने पर: डिमेंशिया वाले व्यक्तियों में पार्किंसन के लक्षण भी हो सकते हैं. पार्किंसन किस्म के लक्षण की समस्या “डिमेंशिया विथ लुइ बॉडीज” वाले लोगों में आम है, और कुछ अन्य प्रकार के डिमेंशिया में भी हो सकती है
  • डॉक्टर से जानकारी और सलाह: डॉक्टर स्थिति के अनुसार तय करेंगे कि व्यक्ति को किन लक्षणों में कैसे राहत देने की कोशिश करें. वे देखेंगे कि लक्षण कितने गंभीर हैं और किस क्रम में पेश हुए हैं. रोग-निदान भी डॉक्टर उसी अनुसार देंगे. परिवार वालों को डॉक्टर से खुल कर बात कर लेनी चाहिए ताकि वे देखभाल के लिए तैयार हो पायें.

अधिक जानकारी के लिए रेफरेंस: हिंदी में जानकारी:

अधिक जानकारी के लिए रेफरेंस: कुछ उपयोगी, विश्वसनीय अंग्रेजी वेब साईट और पृष्ठ:

डिमेंशिया से सम्बंधित अन्य रोगों पर हिंदी में विस्तृत पृष्ट देखें:

चित्रों का श्रेय: कोशिका में लुई बॉडी का चित्र: Marvin 101 (Own work) [CC BY-SA 3.0] (Wikimedia Commons) पार्किंसन के व्यक्ति का चित्र: By Sir_William_Richard_Gowers_Parkinson_Disease_sketch_1886.jpg: derivative work: Malyszkz [Public domain], via Wikimedia Commons

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भारत में डिमेंशिया, 2015: परिवारों की मदद कैसे करें (एक चित्रण)

पिछले कुछ ब्लॉग पोस्ट से स्पष्ट है कि जिन परिवारों में किसी को डिमेंशिया है, उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. परन्तु भारत में डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के बारे में जागरूकता कम है, और जरूरी सहायता और सेवाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं. समय पर रोग निदान नहीं हो पाता, और कई साल लंबे इस डिमेंशिया के सफर में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.

डिमेंशिया से ग्रस्त लोगों और उनकी देखभाल कर रहे परिवार वालों की मदद कैसे करें?

भारत में डिमेंशिया संबंधी नीति और कार्यक्रमों की जरूरत है. उपयुक्त देखभाल प्रणाली बननी चाहिए, जो परिवार वाले अपना सकें. दवाओं के लिए शोध होना चाहिए. निधान और सपोर्ट करने वाले विशेषज्ञों की संख्या कम है; शिक्षा और प्रशिक्षण द्वारा यह क्षमता बढ़ानी होगी. समाज में डिमेंशिया जागरूकता और जानकारी बढ़नी चाहिए. सेवाओं को उपलब्ध कराना होगा. परिवारों को सलाह और सहायता मिलनी चाहिए. इन सब क्षेत्रों में सरकार, विशेषज्ञ, स्वयंसेवक, निजी कंपनी, गैर सरकारी संगठन वाले, इत्यादि, योगदान कर सकते हैं और परिवार वालों का काम कम कर सकते हैं.

आम आदमी भी छोटे और बड़े कामों से परिवार वालों की स्थिति में सुधार ला सकते हैं. हम सब योगदान कर सकते हैं. आस पास के लोगों में लक्षणों के प्रति सतर्क रह सकते हैं, जागरूकता फैला सकते हैं. समाज को डिमेंशिया-फ्रेंडली (dementia-friendly community)बनाने में योगदान कर सकते हैं. डिमेंशिया वाले परिवारों के प्रति संवेदनशील रह सकते हैं, और अपनी हिम्मत के अनुसार उनके छोटे-बड़े काम बाँट सकते हैं. हम उनके तनाव और डिप्रेशन में उनके साथ रह सकते हैं, और उन्हें भावनात्मक सपोर्ट दे सकते हैं. हम किसी डिमेंशिया-संबंधी संस्था से संपर्क करके अपना समय, कौशल और पैसे भी दे सकते हैं. हम शोध और सर्वे में भी भाग ले सकते हैं.

हम सब डिमेंशिया वाले परिवारों की मदद कैसे कर सकते हैं, इस पर कुछ सुझावों का चित्रण नीचे देखें. यह चित्र एक चार-भाग वाले इन्फोग्राफिक का चौथा भाग है.

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भारत में डिमेंशिया, 2015: भविष्य के लिए अनुमान

समय के साथ साथ भारत में डिमेंशिया (मनोभ्रंश) से ग्रस्त लोगों की संख्या बढ़ रही है और परिवारों पर डिमेंशिया और सम्बंधित देखभाल का असर भी बढ़ रहा है.

भारत में वृद्धों की संख्या बढ़ रही है. लोग दीर्घायु हो रहे हैं. 1950-55 में जन्म पर जीवन प्रत्याशा सिर्फ 36.62 साल थी, पर 2010-2015 में यह बढ़कर 67.47 हो गयी है और अनुमान है कि 2045-2040 तक यह 75.87 साल होगी. नतीजतन, कुल आबादी में 60+ आयु वाले लोगों का प्रतिशत भी बढ़ेगा. 2015 में यह 8.9% है, और अनुमान है कि 2050 में यह अनुपात 19.4% हो जाएगा. यह इतना बड़ा फर्क है कि अपने चारों तरफ देखने से स्पष्ट होगा कि आबादी में वृद्ध लोग ज्यादा हैं. कुछ लोग इस तथ्य को “India is greying” या “India is ageing” कह कर व्यक्त करते हैं (“भारत बूढ़ा हो रहा है”).

उम्र बढ़ने पर डिमेंशिया होने का खतरा भी बढ़ जाता है. हर 6.6 साल उम्र बढ़ने से डिमेंशिया का खतरा दुगना हो जाता है. 60 साल से कम उम्र के लोगों में डिमेंशिया बहुत ही कम पाया जाता है. आयु वर्ग 60-65 में 1.9% लोगों में डिमेंशिया पाया जाता है, पर 85-89 आयु वर्ग में अनुमान है कि 23% लोगों को डिमेंशिया होता है, और 90+ आयु वर्ग में तो यह 44.1% है.

दोनों बातों को जोड़ें तो स्थिति की गंभीरता और स्पष्ट नज़र आने लगती है. हमारी आबादी में वृद्ध लोगों की संख्या और अनुपात बढ़ रहे हैं, और वृद्ध लोगों को डिमेंशिया होने का ज्यादा खतरा है. वर्ष 2050 के लिए अनुमान है कि डिमेंशिया से ग्रस्त लोग तकरीबन 133.3 लाख होंगे, जो वर्तमान के मुकाबले 225% की वृद्धि है. इसके मुकाबले कुल आबादी सिर्फ 30% बढ़ेगी. यानि कि अधिक परिवारों में डिमेंशिया वाले व्यक्ति होंगे, और डिमेंशिया संबंधी सहायता और सेवाओं की जरूरत बहुत बढ़ेगी.

भविष्य में भारत में डिमेंशिया कितना अधिक होगा, इसका चित्रण नीचे देखें. यह चित्र एक चार-भाग वाले इन्फोग्राफिक का तीसरा भाग है.

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भारत में डिमेंशिया, 2015: देखभाल की चुनौतियाँ (एक चित्रण)

भारत में डिमेंशिया (मनोभ्रंश) से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल का काम अधिकाँश केस में उस व्यक्ति के परिवार वाले संभालते हैं.

डिमेंशिया का सफर कई साल चलता है. इस दौरान व्यक्ति की क्षमताएं घटती जाती हैं, और निर्भरता बढ़ती जाती है. शुरू में तो ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं होती, पर व्यक्ति का हाल बिगड़ता रहता है और समय के साथ साथ अधिक सतर्कता और मदद की जरूरत होने लगती है.

देखभाल करने में अनेक प्रकार की दिक्कतें होती हैं. देखभाल के लिए अधिक पैसे और समय की जरूरत होने लगती है. पर देखभाल कैसे करें, इसके लिए क्या प्लान करें, आगे क्या क्या हो सकता है, इस सब को समझने के लिए जरूरी जानकारी नहीं मिल पाती. सेवाएँ और सहायता भी नहीं उपलब्ध हैं. देखभाल करने वाले अकेले पड़ जाते हैं, थक जाते हैं, आर्थिक समस्याओं का सामना करते हैं, और समाज की निंदा भी सहते हैं. अनेक देखभाल करने वाले डिप्रेशन और तनाव से ग्रस्त होते हैं.

भारत में डिमेंशिया देखभाल की सच्चाइयों का एक चित्रण नीचे पेश है. इसमें भारत में देखभाल की स्थिति और चुनौतियों को दिखाया गया है. यह चित्र एक चार-भाग वाले इन्फोग्राफिक का दूसरा भाग है.

नीचे देखें: भारत में डिमेंशिया देखभाल की चुनौतियाँ:

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भारत में डिमेंशिया, 2015: वर्तमान स्थिति (एक चित्रण)

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के बारे में जागरूकता कम है, इसलिए अक्सर लोग सोचते हैं कि शायद भारत में लोगों को डिमेंशिया नहीं होता, या होता भी है तो अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम होता है. सच तो यह है कि पर भारत में भी कई लोगों को डिमेंशिया है, पर डिमेंशिया की सही पहचान नहीं हो पाती, और डिमेंशिया वाले व्यक्ति को न तो सही उपचार मिल पाता है, न ही परिवार वाले देखभाल के उपयुक्त तरीके इस्तेमाल कर पाते हैं.

डिमेंशिया पर कई प्रकाशित रिपोर्ट हैं, पर आम लोगों को ऐसी रिपोर्ट पढ़ने और समझने के लिए टाइम नहीं होता. इसलिए मैंने भारत में डिमेंशिया और देखभाल की वर्तमान स्थिति और भविष्य के अनुमान का अंग्रेज़ी और हिंदी में चित्रण तैयार करा है. यह चित्रण (इन्फोग्राफिक) चार भागों में है: वर्तमान स्थिति, देखभाल की चुनौतियाँ, भविष्य के लिए अनुमान, और परिवार वालों की मदद कैसे करें.

नीचे देखें इस इन्फोग्राफिक का पहला भाग: भारत में डिमेंशिया की वर्तमान स्थिति:

dementia-india-2015-infographic-current-status-hindi

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Alzheimer’s and the brain अल्ज़ाइमर रोग में मस्तिष्क के बदलाव: एक चित्रण

अल्ज़ाइमर रोग(Alzheimer’s Disease) डिमेंशिया (मनोभ्रंश) का एक आम कारण है. इस रोग में मस्तिष्क में किस प्रकार हानि होती है, और समय के साथ यह कैसे बढ़ती है, उसका एक चित्रण, National Institute on Aging के सौजन्य से:

Alzheimers disease-brain shrinkage

Memories of mother’s early dementia: डिमेंशिया के शुरू के दिन और माँ की याददाश्त की प्रॉब्लम

कुछ दिन पहले, याददाश्त के बारे में लिखते हुए, मुझे बहुत साल पहले की कुछ घटनाएं यकायक याद आ गयीं. ये उस समय की हैं जब माँ को डिमेंशिया का निदान नहीं मिला था, पर हमने डॉक्टर के चक्कर काटने शुरू कर दिए थे क्योंकि माँ कभी कभी शिकायत करती थीं कि उन्हें याददाश्त में कुछ प्रॉब्लम है. पर कई बार वे इस बात से साफ मुकर जाती थीं कि कुछ गड़बड़ है–कहती थीं कि मुझे तो कुछ नहीं हुआ है, तुम लोग मुझे पागल कर रहे हो.

एक दिन हम कुछ बात कर रहे थे और मैंने किसी पुरानी, इम्पोर्टेन्ट घटना का जिक्र करा. माँ मुझे ऐसे ताकने लगीं जैसे कि मैंने कोई बहुत ही अटपटी बात कही हो. मैंने पूछा, याद नहीं क्या? उन्होंने कहा, नहीं. बस फिर क्या था, मैं उनकी याद ताजा करने कि लिए उस घटना के आगे-पीछे की घटनाओं का ताँता बाँधने लगी. घटना को भी विस्तार में बताने लगी. भला ऐसे भी कोई भूल सकता है!

पर मेरी काफी कोशिश के बाद भी माँ यही कहती रहें, नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं हुआ था, तुम्हें जरूर गलतफहमी हो रही है.

जब मैं फिर भी उन्हें याद दिलाने की कोशिश में लगी रही, तो वे बौखला गयीं. बोलीं: जब मुझे ऐसा कुछ भी याद नहीं, तो मैं तुम्हारे कहने पर कैसे यकीन कर लूं? मैं अपनी यादों पर यकीन करूँ, अपने ऊपर यकीन करूं, या कि किसी दूसरे की बातों पर? तुम्हारी याद कुछ गड़बड़ा रही होगी. पता नहीं तुम मेरे पीछे क्यों पड़ी हो!

मैं चुप हो गयी. मेरे पास उनके इस तर्क के लिए कोई प्रत्युत्तर नहीं था. सच ही तो है, इंसान अपनी यादों के ऊपर यकीन न करके किसी और पर यकीन करे, यह तो बेवकूफी लगती है.

एक अन्य वाकया, यह भी निदान से पहले के दिनों का.

माँ को बाजार से कुछ पसंदीदा नमकीन मंगवाना था. उन्होंने मुझसे कहा, और मैंने कहा, ठीक है, ले आऊँगी. कुछ मिनट बाद उन्होंने अपनी बात दोहराई, और मैंने फिर कहा, हाँ, जरूर ले आऊँगी. फिर कुछ मिनट बाद उन्होंने फरमाइश दोहराई. मैंने फिर हामी भर दी.पर जब यह अगले एक घंटे में छह बार फिर से हुआ, तो मैं चिड़चिड़ा कर बोली, आप और कितनी बार यह बात दोहराएँगी, मैंने कह तो दिया ले आऊँगी.

इस पर वे उत्तेजित हो गयीं.

बोलीं, मैंने तो तुम से इसके बारे में पहले नहीं कहा था. तुम झूठ बोल रही हो. और तुम मुझ से ऐसी आवाज़ में कैसे बोल सकती हो, तमीज नहीं क्या?

मैं फिर चुप, परेशान. सोचने लगी, ऐसे कैसे हो सकता है कि एक घंटे में इतनी बार एक ही बात की रट लगाने के बाद भी उन्हें यह याद नहीं कि वे मुझसे नमकीन लाने को कह चुकी हैं? फिर सोचा, यदि सचमुच उनको इस तरह की प्रॉब्लम है तब तो वे क्या भूलेंगी, क्या नहीं, यह मुझे कैसे पता चलेगा? मैं क्या करूँ?

मैं उन दिनों यह नहीं जानती थी कि ऐसा ‌‍किस्से तो एक लम्बी देखभाल के सिलसिले की शुरूआत के सूचक हैं. फिर माँ का निदान हुआ, डिमेंशिया के बारे में मेरी समझ बढ़ी, और उस समझ के साथ ऐसी स्थिति से जूझने के लिए सब्र भी बढ़ा, और तरीके भी सीखे…