भारत में डिमेंशिया, 2015: देखभाल की चुनौतियाँ (एक चित्रण)

भारत में डिमेंशिया (मनोभ्रंश) से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल का काम अधिकाँश केस में उस व्यक्ति के परिवार वाले संभालते हैं.

डिमेंशिया का सफर कई साल चलता है. इस दौरान व्यक्ति की क्षमताएं घटती जाती हैं, और निर्भरता बढ़ती जाती है. शुरू में तो ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं होती, पर व्यक्ति का हाल बिगड़ता रहता है और समय के साथ साथ अधिक सतर्कता और मदद की जरूरत होने लगती है.

देखभाल करने में अनेक प्रकार की दिक्कतें होती हैं. देखभाल के लिए अधिक पैसे और समय की जरूरत होने लगती है. पर देखभाल कैसे करें, इसके लिए क्या प्लान करें, आगे क्या क्या हो सकता है, इस सब को समझने के लिए जरूरी जानकारी नहीं मिल पाती. सेवाएँ और सहायता भी नहीं उपलब्ध हैं. देखभाल करने वाले अकेले पड़ जाते हैं, थक जाते हैं, आर्थिक समस्याओं का सामना करते हैं, और समाज की निंदा भी सहते हैं. अनेक देखभाल करने वाले डिप्रेशन और तनाव से ग्रस्त होते हैं.

भारत में डिमेंशिया देखभाल की सच्चाइयों का एक चित्रण नीचे पेश है. इसमें भारत में देखभाल की स्थिति और चुनौतियों को दिखाया गया है. यह चित्र एक चार-भाग वाले इन्फोग्राफिक का दूसरा भाग है.

नीचे देखें: भारत में डिमेंशिया देखभाल की चुनौतियाँ:

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भारत में डिमेंशिया, 2015: वर्तमान स्थिति (एक चित्रण)

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के बारे में जागरूकता कम है, इसलिए अक्सर लोग सोचते हैं कि शायद भारत में लोगों को डिमेंशिया नहीं होता, या होता भी है तो अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम होता है. सच तो यह है कि पर भारत में भी कई लोगों को डिमेंशिया है, पर डिमेंशिया की सही पहचान नहीं हो पाती, और डिमेंशिया वाले व्यक्ति को न तो सही उपचार मिल पाता है, न ही परिवार वाले देखभाल के उपयुक्त तरीके इस्तेमाल कर पाते हैं.

डिमेंशिया पर कई प्रकाशित रिपोर्ट हैं, पर आम लोगों को ऐसी रिपोर्ट पढ़ने और समझने के लिए टाइम नहीं होता. इसलिए मैंने भारत में डिमेंशिया और देखभाल की वर्तमान स्थिति और भविष्य के अनुमान का अंग्रेज़ी और हिंदी में चित्रण तैयार करा है. यह चित्रण (इन्फोग्राफिक) चार भागों में है: वर्तमान स्थिति, देखभाल की चुनौतियाँ, भविष्य के लिए अनुमान, और परिवार वालों की मदद कैसे करें.

नीचे देखें इस इन्फोग्राफिक का पहला भाग: भारत में डिमेंशिया की वर्तमान स्थिति:

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विश्व अल्ज़ाइमर दिवस 2015 के अवसर पर डिमेंशिया देखभाल पर कुछ विचार

दुनिया भर में सितम्बर का महीना “विश्व अल्ज़ाइमर माह” (World Alzheimer’s Month) के रूप में मनाया जाता है, और सितम्बर 21 “विश्व अल्ज़ाइमर दिवस” (World Alzheimer’s Day) के रूप में मनाया जाता है. (अल्जाइमर रोग डिमेंशिया के लक्षण पैदा करने वाले रोगों में मुख्य है). इस महीने विशेषज्ञ और स्वयंसेवक अनेक कार्यक्रमों द्वारा डिमेंशिया और संबंधित देखभाल के बारे में जानकारी फैलाने का खास प्रयत्न करते हैं. अखबारों और पत्रिकाओं में भी डिमेंशिया पर लेख प्रकाशित होते हैं. इस ब्लॉग पोस्ट द्वारा मैं भी डिमेंशिया देखभाल के बारे में कुछ बांटना चाहती हूँ.

यदि आप डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं तो आप शायद अन्य देखभाल करने वाले परिवारों के अनुभव जानना चाहते होंगे. आप यह जानना चाहते होंगे कि आपके प्रियजन को किस प्रकार की समस्याएँ हो सकती है, देखभाल के क्या तरीके हैं, लोग तनाव से कैसे बचते हैं, देखभाल की योजना कैसे बनाते हैं.

यूं समझिए, डिमेंशिया देखभाल एक सालों लंबा सफर है. परिवार वालों को व्यक्ति की समस्याएं समझने में समय लगता है. स्थिति स्वीकारने में, और उचित सहायता के तरीके ढूंढ़ने में और बदलाव करने में टाइम लगता है, मेहनत करनी पड़ती है. गलतियों होती हैं, निराशा होती है, एक दूसरे पर गुस्सा आता है. धीरे धीरे हालत सुधरने लगती है और परिवार वाले सोचते हैं कि शुक्र है, अब तो सब ठीक-ठाक चलने लगा है. फिर व्यक्ति का डिमेंशिया कुछ नई समस्या पैदा कर देता है, हालत और बिगड़ जाती है. परिवार वालों को समझने और तरीके ढूंढ़ने का सिलसिला फिर शुरू करना पड़ता है. देखभाल के इस सफर में उतार-चढ़ाव होते ही रहते हैं. और हर परिवार में स्थिति और उपाय अलग होते हैं.

अन्य परिवारों के देखभाल संबंधी अनुभव जानने से फायदा हो सकता है, पर ऐसे अनुभव जान पाना आसान नहीं है.

किसी देखभाल कर्ता से पूछें कि देखभाल करने का आपका अनुभव क्या है, तो वे वही कहेंगे जो उन्हें उस पल याद आता है, और जो वे बेझिझक बाँट सकते हैं. सालों-साल चलने वाले डिमेंशिया का निचोड़ यकायक चंद वाक्य में कोई कैसे दे! स्वाभाविक है कि कई लोग हाल में हुई घटनाओं पर या अभी हो रही समस्याओं पर बात करेंगे. एक महीने बाद यदि आप उन से फिर पूछें, तो वे शायद उस घटना का जिक्र ही न करें, या किसी नई समस्या के बारे में बात करें, जो अब उन्हें परेशान कर रही है. डिमेंशिया किस अवस्था में है, परिवार का अनुभव इस पर निर्भर है. डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति शुरूआती अवस्था में हो तो परिवार वाले कुछ कहेंगे, और अंतिम अवस्था हो तो कुछ और कहेंगे.

शर्म और झिझक अनुभव बांटने में बाधा पैदा करते हैं. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो लोग दूसरों को इसलिए नहीं बताएँगे क्योंकि उन्हें शर्म आती है, या उन्हें लगता है कि सुनने वाले उनकी निंदा करेंगे या उन्हें हीन या नालायक समझेंगे. खुल कर लोग तभी बात कर पाते हैं जब कि माहौल उन्हें सुरक्षित लगे और उन्हें भरोसा हो कि कोई उनकी बात लेकर उनकी निंदा नहीं करेगा.

सब परिवारों के अनुभव अलग होते हैं. यदि यह जानना हो कि डिमेंशिया में किस किस तरह के अनुभव हो सकते है तो कई लोगों से बात करनी होगी. सिर्फ एक या दो प्रकाशित लेखों को पढ़कर आपको सही और पूरी जानकारी नहीं मिल सकती. ये लेख कुछ परिवारों के कुछ अनुभव प्रस्तुत करते हैं. लेख आपके लिए कितना उपयोगी है यह इस पर निर्भर है कि रिपोर्टर ने किस इरादे से लेख लिखा है. और लेख में जो पेश है वह सिर्फ एक झलक है, क्योंकि रिपोर्टर ने तो सिर्फ कुछ परिवार चुने हैं, और उनकी बातों से सिर्फ वे कुछ अंश चुने हैं जो लेख में फिट हो रहे थे. वैसे भी कई लोग इंटरव्यू में खुल कर नहीं बोलते. शायद आप के लिए जिन देखभाल करने वालों के अनुभव उपयोगी हो सकते थे उनका इंटरव्यू न हुआ हो. शायद लेख में जो प्रस्तुत है वह अंश आपके मतलब का न हो, या आपको गलत जानकारी दे.

यदि आपको डिमेंशिया के अनुभवों के बारे में ठीक से जानकारी चाहिए तो आपको अनेक परिवारों की कहानियाँ जाननी होंगे. लेख, किताबें, ब्लॉग पढ़ने होंगे. अन्य देखभाल करने वालों से बात करनी होगी. अपनी कहानी बांटनी होगे, और दूसरों की कहानी सुननी होगी. समर्थक समुदाय में भाग लेना होगा. जितने ज्यादा परिवार वाले आपस में खुल कर बात करें, उतना ही अच्छा होगा. समुदाय के तौर पर हम सभी एक दूसरे की मदद कर सकते हैं, समर्थन दे सकते हैं.

मैं भी कई साल तक देखभाल कर्ता रह चुकी हूँ. अपने निजी अनुभव से मैं जानती हूँ कि डिमेंशिया और देखभाल के सफर में उचित जानकारी से देखभाल आसान और कारगर हो सकती है, और तनाव और अकेलापन भी कम हो जाता है. दूसरों के किस्से सुनने से मुझे माँ के डिमेंशिया को स्वीकारने में आसानी हुई थी, और उपयोगी सुझाव भी मिले थे. मैंने भी अपने अनुभव खुल कर ब्लॉग और वीडियो द्वारा बांटे हैं. और अपने डिमेंशिया वेबसाइट पर मैंने अनेक देखभाल करने वालों के विस्तृत इंटरव्यू प्रकाशित करे हैं. अखबारों में और अन्य ब्लॉग और साईट पर उपलब्ध देखभाल की कहानियों के लिंक भी एकत्रित करे हैं. डिमेंशिया देखभाल के क्षेत्र में यह मेरा एक योगदान है. कुछ लिंक:

धूम्रपान कैसे बंद करें (ताकि उससे जुड़ी बीमारियों का खतरा कम हो)

 

Cigarette in ashtray (option 2 of 2)

हर वर्ष मई 31 “विश्व तंबाकू निषेध दिवस” (वर्ल्ड नो टोबाको डे, World No Tobacco Day) के रूप में मनाया जाता है. धूम्रपान का डिमेंशिया के साथ भी सम्बन्ध है, इसलिए मैंने सोचा कि इस विषय पर अपने ब्लॉग पर कुछ लिखूं. फिर लगा, धूम्रपान के हानिकारक होने पर मीडिया में अक्सर चर्चा होती है और कई व्यक्ति इस आदत से छुटकारा भी चाहते हैं, इसलिए इस ब्लॉग पोस्ट में मैंने धूम्रपान कैसे छोड़ें (धूम्रपान विरति, स्मोकिंग सेसेशन, smoking cessation) पर ज्यादा फोकस करा है:

धूम्रपान (स्मोकिंग) के अनेक दुष्प्रभाव हैं (इनमें डिमेंशिया मौजूद है)

तंबाकू का प्रयोग हृदय और फेफड़ों को प्रभावित करता है, और इनसे जुड़ी बीमारियों को जन्म दे सकता है, जैसे कि दीर्घकालिक प्रतिरोधी फेफड़े के रोग (COPD), वातस्फीति (Emphysema), दिल का दौरा, कैंसर (विशेष रूप से फेफड़ों का कैंसर, गले और मुंह का कैंसर और अग्नाशयी कैंसर). (अधिक चर्चा/ वर्णन के लिए अनेक ऑनलाइन लेख उपलब्ध हैं–कृपया नीचे दिए गए लिंक देखें)

अब धूम्रपान के हानिकारक प्रभावों की लंबी सूची में एक और भी है: धूम्रपान डिमेंशिया का एक संभावित कारक है

  • Smoking is a risk factor for dementia, and quitting could reduce the dementia burden.
  • Second-hand smoke exposure may also increase the risk of dementia.
  • 14% of Alzheimer’s disease cases worldwide are potentially attributed to smoking.

From World Health Organization’s publication: TOBACCO & DEMENTIA

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization, WHO) की जून 2014 की रिपोर्ट, TOBACCO & DEMENTIA में इसपर विस्तृत चर्चा है. यह रिपोर्ट अनेक शोध परिणामों पर आधारित है, और इसके अनुसार धूम्रपान और डिमेंशिया में सम्बन्ध है, और विश्व भर के अल्ज़ाइमर रोग से ग्रस्त लोगों में से 14% केस में शायद धूम्रपान जिम्मेदार है.

रिपोर्ट के अनुसार डिमेंशिया का सम्बन्ध सभी भी प्रकार के धूम्रपान के साथ है, जैसे कि बीड़ी, सिगरेट, सिगार, पाइप, रोल-योर-ओन, शीशा/ हुक्का, इत्यादि. अप्रत्यक्ष धूम्रपान (सेकेंड हैंड धूम्रपान, second-hand smoking, passive smoking) से भी डिमेंशिया का खतरा बढ़ता है. यानि कि, किसी दूसरे के धूम्रपान के कारण यदि आप तम्बाकू के धुएं का अनैच्छिक सेवन कर रहे हों, तो आपकी डिमेंशिया की संभावना बढ़ जाती है. (उद्धरण के लिए बॉक्स देखें)

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धूम्रपान बंद करने (विरति) के फायदे तुरंत मिलने लगते हैं

सिगरेट के हर कश में कई जहरीले पदार्थ होते हैं, और जब कोई धूम्रपान करता है तो उसके शरीर को इन पदार्थों के कारण हो रही हानि को रिपेयर करना पड़ता है. यदि व्यक्ति कुछ देर धूम्रपान न करे तो उसके शरीर को इस रिपेयर के लिए कुछ ज्यादा टाइम मिल पाता है. कुछ घंटे, कुछ दिन, कुछ हफ्ते, जितना भी टाइम व्यक्ति धूम्रपान से दूर रह पाता है, उतना ही अच्छा होता है. धूम्रपान किसी भी उम्र में छोड़ें (या कम करें), स्वास्थ्य में फायदा होगा. इस फायदे के बारे में पढ़ें: धूम्रपान तम्बाकू के संदर्भ में , FAQ’s on smoking and quitting smoking, और अन्य नीचे दिए गए लिंक पर.

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धूम्रपान हानिकारक है, यह सन्देश कई जगह मौजूद है

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धूम्रपान पर पोस्टर — एक उदाहरण

धूम्रपान हानिकारक है, यह बताने और याद दिलाने के लिए अनेक सन्देश रोज हमारे सामने आते रहते हैं. सिगरेट के पैक पर मोटे मोटे अक्षरों में चेतावनी लिखी होती है. टीवी और फिल्मों में डरावने चित्र और सन्देश होते हैं. टीवी के हरेक प्रोग्राम में अगर स्क्रीन पर कहीं भी कोई भी किरदार सिगरेट सुलगाता है तो तुरंत नीचे सन्देश आ जाता है कि धूम्रपान और तंबाकू मौत का कारण हैं, या “Smoking/ tobacco kills.” या “Smoking is injurious to health. It causes cancer”, इत्यादि.

No smoking sign at the Shanti Stupa (Friar's Balsam Flickr)
धूम्रपान निषेध का साइन: लेह

इसके अलावा अब सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान निषेध है. होटलों में, हवाईजहाज में, ऑफिस में, अस्पतालों में, अनेक जगह धूम्रपान पर सख्त मनाई है, और धूम्रपान करने पर फाइन हो सकता है. जगह जगह ऐसे निषेध के नोटिस यह याद दिलाते हैं कि धूम्रपान के कई नुकसान हैं–धूम्रपान करने वाले के लिए तो नुकसान है ही, सेकेण्ड-हैंड स्मोक के कारण आस-पास वालों को भी नुकसान है. लोग भी ज्यादा सचेत हैं. कई बार आस पास के लोग व्यक्ति से कह देते हैं कि कृपया यहाँ सिगरेट न जलाएं, हमें धुआँ पसंद नहीं है/ यह नो-स्मोकिंग एरिया है.

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अफ़सोस, आदत से छुटकारा पाना कठिन है

जो लोग धूम्रपान नहीं करते वे सोचते हैं कि व्यक्ति जब धूम्रपान के नुकसान समझ लेंगे तो आदत त्याग देंगे, आखिर स्वास्थ्य की समस्याएँ कौन जान-बूझकर मोल लेगा! पर यदि संदेशों से विचलित होकर धूम्रपान छोड़ना आसान होता, तो हमारे आस पास इतने लोग सिगरेट सुलगाते नहीं नज़र आते. सच तो यह है कि यह आदत किसी भी वजह से शुरू हुई हो, आदत पड़ जाने के बाद इससे छुटकारा बहुत मुश्किल है.

तंबाकू एडिक्टिव है: तंबाकू में मौजूद निकोटीन एक नशा पैदा करने वाला एडिक्टिव पदार्थ (लत लगाने वाला पदार्थ, addictive substance) है, जो हेरोइन और कोकीन जैसा एडिक्टिव है. तंबाकू सेवन में एक आनंद आता है और इस आनंद के कारण व्यक्ति की आदत और पक्की होती जाती है. सिगरेट बिना रहा नहीं जाता.

तंबाकू सेवन बंद करने पर विद्ड्रॉल लक्षण (परिहार, विनिवर्तन लक्षण, withdrawal symptoms) होते हैं: शुरू शुरू में तो धूम्रपान करने पर व्यक्ति का अनुभव सुखद होता है, पर समय के साथ साथ तंबाकू सेवन के कारण व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से निकोटीन पर निर्भर (आधीन, dependent) हो जाता है. धूम्रपान बंद करने पर शारीरिक और मानसिक लक्षण (विद्ड्रॉल सिम्पटम) होते हैं. ये लक्षण हर व्यक्ति में अलग अलग होते हैं, आम तौर पर देखे जाने वाले लक्षण हैं: नींद आने में दिक्कत, चिडचिडापन, थकान, बेचैनी, मूड अजीब होना, अवसाद, सोचने में और काम करने में ध्यान न लग पाना (एकाग्रता में दिक्कत), भूख कम या ज्यादा लगना, चक्कर आना, वजन बढ़ना, वगैरह. छोड़ने के बाद पहले दो-तीन हफ्ते ये लक्षण खास तौर से तीव्र होते हैं जिससे छोड़ने के इरादे पर कायम रहना मुश्किल हो जाता है. इन लक्षणों से जूझने पर कॉउन्सिलर और डॉक्टर से सलाह मिल सकती है (कई अच्छे वेबसाइट पर भी जानकारी मौजूद है)

सिगरेट सुलगाना अक्सर व्यक्ति की जीवन शैली और याराना/ मेलजोल का एक अभिन्न अंग होता है: सिगरेट सुलगाने और कश भरने की आदत व्यक्ति की अनेक गतिविधियों से जुड़ी होती है. दोपहर के खाने के बाद ऑफिस से बाहर निकलकर दोस्तों के साथ सिगरेट पीना, शाम को घर आकर अखबार खोलकर या बीयर के साथ साथ सिगरेट पीना, तनाव महसूस करने पर जेब में सिगरेट टटोलना, बेचैनी होने पर हाथ में सिगरेट रखना, स्टाइल के लिए हवा में धुआँ छोड़ना, लोगों के साथ गप्पें मारते हुए सिगरेट पीना, यह सब दिन का एक अंश हो जाते हैं. धूम्रपान छोड़ने की कोशिश कर रहे हों तो ऐसे मौकों पर हुड़क की इक्छा ज्यादा तगड़ी होती है. सिगरेट पीने के बजाए ऐसे अवसरों पर क्या कर सकते हैं, व्यक्ति को यह पहले से सोच कर रखना होता है वरना ऐन मौके पर बहुत दिक्कत होती है.

अगर सिगरेट और शराब दोस्तों के साथ उठने बैठने का एक अंश है, तो शायद कई दोस्त व्यक्ति से कहें कि भई एक सिगरेट पी लो, एक सिगरेट में क्या नुकसान, तुम कब से इतने डरपोक हो गए हो, बीबी डांटती है क्या? धूम्रपान बंद करने के निश्चय के साथ साथ इस तरह की लोगों की बातों के लिए तैयार होना होता है. यदि दोस्त व्यक्ति के धूम्रपान बंद करने के निर्णय का बार-बार मज़ाक उडाएं या गुस्सा हों, तो दोस्ती में भी शायद दरार पड़े.

दृढ़ निश्चय हो और लगातार कोशिश हो तो धूम्रपान की आदत छोड़ना संभव है, पर जाहिर है कि इसमें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा.

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धूम्रपान विरति और सफलता

Seventy percent of smokers would like to quit smoking, and 50 percent report attempted to quit within the past year…
The majority of smokers who try to quit do so without assistance, though only 3 to 6% of quit attempts without assistance are successful….
…it is common for ex-smokers to have made a number of attempts (often using different approaches on each occasion) to stop smoking before achieving long-term abstinence…
From Smoking Cessation (Wikipedia page)

विकिपीडिया के Smoking Cessation पृष्ठ के अनुसार 70% स्मोकर धूम्रपान छोड़ने की कोशिश करते हैं, और पिछले एक वर्ष में 50% ने कोशिश करी है. पर अधिकाँश स्मोकर मदद नहीं लेते, और बिना मदद के सिर्फ 3 – 6 % प्रयत्न सफल रहते है. इस पृष्ठ पर यह भी बताया गया है कि सफलता पाने से पहले आम तौर पर व्यक्ति कई बार कोशिश कर चुके होते हैं, और इन कोशिशों में वे अलग अलग तरीके अपनाते हैं, तभी उन्हें दीर्घकालिक सफलता हासिल होती है. (उद्धरण के लिए बॉक्स देखें)

अपने आस-पास भी हम कई बार देखते हैं कि कई व्यक्ति आदत से पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हैं, पर अक्सर नाकाम रहते हैं. कभी कभी दो-तीन बार नाकाम होने के बाद वे अगली कोशिश कुछ बेमन से, नाउम्मीदी से करते हैं. कुछ लोग कोशिश करना छोड़ देते हैं और जब कोई उन्हें तंबाकू के दुष्प्रभावों पर लेक्चर देता है तो वे बौखला जाते हैं या हँस के टाल देते हैं. यदि व्यक्ति यह जानते हों कि सफलता अक्सर कई असफल प्रयत्नों के बाद ही मिलती है तो वे कोशिश जारी रखेंगे. वे असफलता के कारण समझकर अपने तरीके को बदलेंगे और फिर से कोशिश करेंगे. कौन सा तरीका कारगर सिद्ध होगा यह तो कोशिश करते रहने से ही पता चलेगा.

धूम्रपान छोड़ने या कम करने में थोड़ी भी सफलता हो तो उससे स्वास्थ्य लाभ है. बेहतर यही होगा कि व्यक्ति ऐसे तरीके आजमाए जो व्यक्तित्व और स्थिति में सबसे अच्छी तरह फिट होते हों, कोशिश जारी रखे, और मदद भी ले.

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धूम्रपान की लत से कैसे मुक्त हों

पक्का इरादा जरूरी है. लत छोड़ने में कई दिक्कतें आयेंगी और व्यक्ति को अपने दिनचर्या बदलना होगा, शायद कुछ पुराने मित्र भी छूट जाएँगे. सिगरेट की लालसा बार-बार उठेगी, और शारीरिक और मानसिक तकलीफ होगी. दृढ़ निश्चय न हो तो इतनी मेहनत नहीं हो पायेगी.

प्लैन बनाएँ: सिलसिला पक्के इरादे से शुरू होता है, पर साथ साथ पूरी जानकारी प्राप्त करके एक योजना बनानी होगी. इसे क्विट स्मोकिंग प्लैन–Quit Smoking Plan– भी कहते हैं.

No Smoking - American Cancer Society's Great American Smoke Out

धूम्रपान बंद करने के लिए अनेक तरीके (method) हैं, और व्यक्ति को अपनी स्थिति और पसंद के अनुसार इनको मिला कर अपने लिए उपयुक्त योजना बनानी होगी. कुछ आम तरीके हैं — कोल्ड टर्की (अचानक बंद करना, cold turkey), धीरे धीरे कम करना (cut down to quit), दवाई की सहायता से बंद करना (जैसे कि निकोटीन प्रतिस्थापन चिकित्सा, अवसादरोधी, अन्य दवाइयाँ– nicotine replacement therapy, antidepressants, varenicline, clonidine, etc.) सम्मोहन (hypnosis), स्वयं की मदद (self-support), सहायता समूह (community support), सहायक सेवाएं (counselling, quitlines, mobile apps), धार्मिक संस्थाओं की सहायता लेना, क्लीनिक ज्वाइन करना, वगैरह.

किस व्यक्ति के लिए कौन सा तरीका ठीक बैठेगा, यह व्यक्ति की परिस्थितियों और स्वभाव पर निर्भर है. कुछ लोग स्वयं के लिए एक क्विट स्मोकिंग डे निर्धारित करके निश्चय करते हैं कि उस दिन के बाद एक भी सिगरेट न जलाएंगे–यह कोल्ड टर्की (अचानक बंद करना, cold turkey) है. कुछ व्यक्ति धीरे धीरे कम करने वाला तरीका पसंद करते हैं (cut down to quit)–रोज के चार पैकेट से तीन पैकेट करना, फिर दो, फिर एक, फिर आधा, फिर शून्य. विद्ड्रॉल लक्षण (Withdrawal symptoms) संभालने के लिए कुछ व्यक्ति दवाई लेते हैं. कुछ व्यक्ति पुराने मित्रों से दूर हो जाते हैं क्योंकि उनके साथ उठने बैठने में सिगरेट का प्रलोभन बहुत ज्यादा रहता है. कुछ व्यक्ति परिवार और मित्रगण की सहायता और प्रोत्साहन से छोड़ने की कोशिश करते हैं.

धूम्रपान बंद करना एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण काम है. पक्का इरादा तो चाहिए ही. साथ साथ, धूम्रपान छोड़ने में किस प्रकार की दिक्कतें होंगी, यह सोच-समझ कर “क्विट स्मोकिंग” योजना बनाने से कामयाबी का चांस ज्यादा होता है.

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उपयोगी जानकारी और मदद कहाँ और कैसे ढूंढ़ें

सौभाग्यवश, आजकल धूम्रपान की लत को पछाड़ना पर जानकारी के कई साधन उपलब्ध हैं. मदद के लिए भी कई साधन हैं.

तंबाकू सेवन/ धूम्रपान बंद करने के लिए सहायता का एक रूप है धूम्रपान विरति क्लीनिक (Tobacco cessation clinic, smoking cessation clinic, quit smoking clinic). ऐसे क्लीनिक बड़े अस्पतालों में अलग से एक डीएडिक्शन सेंटर (de-addiction center)/ नशा मुक्ति क्लीनिक के रूप में मिल सकते हैं, या अस्पताल के कैंसर डिपार्टमेंट या मनोचिकित्सा डिपार्टमेंट में भी हो सकते हैं. क्लीनिक अक्सर हफ्ते में एक या दो बार होते हैं. कई कैंसर सहायक संस्थाएं भी इस कार्य में लोगों की सहायता करती हैं. व्यक्ति डॉक्टर या अन्य विशेषज्ञों से भी परामर्श ले सकते हैं, या सपोर्ट ग्रुप (support group) में, आपस में अनुभव और सुझाव बाँट सकते हैं और एक दूसरे को प्रोत्साहन भी दे सकते हैं. इस प्रकार के सपोर्ट ग्रुप से व्यक्ति खुद को अकेला नहीं समझते क्योंकि वे एक समुदाय का हिस्सा बन जाते हैं.

किसी शहर में क्लीनिक कहाँ है, यह जानने के लिए गूगल पर “Tobacco cessation” “smoking cessation” के साथ उस शहर या प्रांत का नाम टाइप करके खोज सकते हैं. शहर के बड़े अस्पतालों से सम्पर्क करें. आपके डॉक्टर भी शायद बता पाएँ कि उचित सलाह कहाँ मिलेगी, और सपोर्ट ग्रुप कहाँ हैं. कैंसर समर्थक संस्थाओं से भी पूछ सकते हैं.

इन्टरनेट पर धूम्रपान छोड़ने के लिए जानकारी और मदद के अनेक संसाधन हैं. कैंसर संस्थाओं के वेबसाइट पर अक्सर इस विषय पर लेख मिलते हैं. एक उदाहरण: मुम्बई स्थित कैंसर पेशेंट्स एड एसोसिअशन के वेबसाइट पर हिंदी में एक पत्रिका उपलब्ध है: धूम्रपान तम्बाकू के सन्दर्भ में(PDF file). अन्य विश्वसनीय स्वास्थ्य संबंधी साईट पर भी इस विषय पर चर्चा मिलती है. कुछ स्वास्थ्य संबंधी संस्थाओं के वेबसाइट पर तो एक पूरा सेक्शन धूम्रपान पर होता है

कुछ संस्थाएं और उनके साईट सिर्फ धूम्रपान छोड़ने वालों के लिए स्थापित करी गयी हैं हैं, और कई सहायक सेवाएं भी देती हैं. आजकल लोगों को दिन भर समय समय पर याद दिलाने के लिए और प्रोत्साहित करने के लिए मोबाइल ऐप भी हैं!! जानकारी गूगल पर “Tobacco cessation” या “smoking cessation” टाइप करके खोजी जा सकती हैं.

कुछ उपयोगी लिंक नीचे दिए गए हैं.

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विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर इस विषय पर सोचें

Bluete in Aschenbecher

हो सकता है आप धूम्रपान करते हों. इस मई 31 को, विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर, जब तंबाकू सेवन के अनेक पहलुओं पर मीडिया में चर्चा हो रही होगी, आप भी इस विषय के बारे में सोच सकते हैं. हो सकता है कि आप आदत छोड़ने की कोशिश कर चुके हैं पर नाकाम रहे हैं; हो सकता है कि छोड़ने का खयाल तक इतना मुश्किल लगता है कि आप हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं. पर आप यह भी जानते हैं कि तंबाकू सेवन के कई दुष्प्रभाव हैं, आपके लिए भी और आपके आसपास वालों के लिए भी. कुछ समय निकालकर तंबाकू विरति पर जानकारी और सुझाव तो देखें, शायद आपको अपने लायक कुछ ठीक लगे.

या हो सकता है कि आप धूम्रपान नहीं करते पर आपका कोई प्रियजन इस आदत से ग्रस्त है. यह पहचानें कि आदत से छुटकारा पाना कितना मुश्किल है, और सोचें कि आप अपने प्रियजन के सिगरेट छोड़ने में किस प्रकार मदद कर सकते हैं, किस प्रकार प्रोत्साहन दे सकते हैं.

यदि आप अब तक इस स्मोकिंग की लत से बचे हुए हैं, तो धूम्रपान के दुष्प्रभावों के बारे में जानने से, और यह देखने पर कि इस लत से मुक्ति कितनी मुश्किल है, उम्मीद है कि आप तंबाकू सेवन के दलदल से दूर ही रहेंगे.

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धूम्रपान करने वालों और उनके प्रियजनों के लिए कुछ उपयोगी लिंक

विकिपीडिया पर उपलब्ध कुछ जानकारी:

  • तम्बाकू धूम्रपान पर हिंदी विकिपीडिया पर पृष्ठ: तम्बाकू धूम्रपान (इसका अंग्रेज़ी पृष्ठ: Tobacco Smoking)
  • तम्बाकू पर हिंदी विकिपीडिया पर पृष्ठ: तम्बाकू
  • स्मोकिंग विरति पर अंग्रेज़ी विकिपीडिया पर पृष्ठ: Smoking Cessation (इस पृष्ठ पर कई उपयोगी लिंक भी मौजूद हैं)
  • भारत में स्मोकिंग पर अंग्रेज़ी विकिपीडिया पर पृष्ठ: Smoking in India

तंबाकू विरति में सहायता के लिए भारत में संसाधन:

  • कुछ बड़े अस्पतालों में तंबाकू छोड़ने के लिए खास क्लीनिक आयोजित होते हैं. जैसे कि दिल्ली में: IHBAS Tobacco Cessation Clinic, Sir Ganga Ram Tobacco Cessation Centre, Tobacco Use Cessation clinic at AIIMS और बेंगलुरु में: Tobacco Cessation Clinic, NIMHANS.
  • कैंसर सम्बंधी संस्थाओं और अस्पतालों में भी तंबाकू छोड़ने के लिए सहायता/ परामर्श उपलब्ध है (साईट पर/ मिलने से): जैसे कि मुम्बई के टाटा मेमोरिअल सेंटर में, या कैंसर पेशेंट्स एड एसोसिअशन
  • कुछ संस्थाएं तंबाकू विरति के क्षेत्र में कार्यरत हैं और वे जानकारी, सुझाव, और समर्थन देती हैं. उदारहण:
    • Tobacco Control Foundation of India इस क्षेत्र में एक संस्थात थी, और उनका एक Tobacco Cessation Program Module भी था , पर अब (Oct 2017) उनका साईट tobaccoindia.org काम नहीं कर रहा और यह नहीं मालूम कि वे अब भी सहायता देते हैं या नहीं.
    • तंबाकू छोड़ने वालों की मदद के लिए इंडियन डेन्टल असोसिएशन (Indian Dental Association) का एक Tobacco Intervention Initiative (TII) है, जिसका उद्देश्य भारत को तंबाकू मुक्त करना है. इनका एक जानकारी भरा वेबसाइट है और एक हेल्पलाइन भी, जिसमे स्वयंसेवक अनेक भारतीय भाषाओं में मदद कर सकते हैं. वेबसाइट पर अनेक पृष्ठ हैं, देखें: Tobacco Intervention Initiative वेबसाइट न्यूज़ रिपोर्ट्स के अनुसार इनकी एक –National Tobacco Cessation Quit Line– हेल्पलाइन भी है: देखें: A helpline for those who want to quit smoking, Quitline launched to help tobacco users (यह रिपोर्ट 2012 की है, मालूम नहीं यह हेल्पलाइन अब भी चालू है या नहीं).
  • कुछ जानकारी विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी जानकारी हेल्पलाइन (Health Information Helpline) को फोन करके भी मिल सकती हैं (यह न्यूज़ रिपोर्ट देखें: ‘Chew gum to quit tobacco addiction’, 104 helpline tells Chhattisgarh CM)
  • अन्य ऑनलाइन जानकारी/ समर्थन या अपने शहर में संसाधन ढूँढने के लिए टिप्स: अस्पतालों, डॉक्टरों या अन्य संस्थाओं से पूछकर भी उपयोगी साधन/ सेवा के बारे में जानकारी मिल सकती है. या गूगल पर खोजें: सर्च बॉक्स में “smoking cessation”, “tobacco cessation”, “quit smoking” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करें, और साथ में अपने शहर/ प्रान्त का नाम भी टाइप करें. आप डीएडिक्शन क्लीनिक (de-addiction centres) / नशा मुक्ति पर भी खोज कर सकते हैं — शायद वे तंबाकू विरति के लिए भी समर्थन दें.

इन्टरनेट पर उपलब्ध कुछ (अंग्रेज़ी में) जानकारी, सलाह, इत्यादि:

  • धूम्रपान बंद करने वालों के लिए एक अत्यंत उपयोगी वेबसाइट है Smokefree.gov. इसपर धूम्रपान से छुटकारा पाने की कोशिश करने वालों के लिए विस्तृत जानकारी, सलाह, और सहायता है. उपयोगी मोबाइल ऐप के बारे में भी जानकारी है.
  • अमरीकन कैंसर सोसाइटी American Cancer Society (ACS) के वेबसाइट पर धूम्रपान की आदत त्यागने पर विस्तृत चर्चा है, जैसे कि स्मोकिंग विरति में किस प्रकार की दिक्कतें होती हैं, स्मोकिंग बंद करने से किस प्रकार के फायदे होते हैं और कब होते हैं, मानसिक और शारीरिक रूप से इस एडिक्शन से कैसे जूझें, क्विट स्मोकिंग प्लैन कैसे बनाएँ, दवाई का इस्तेमाल करें या नहीं, वगैरह. देखें: Why is it so hard to quit smoking? और उस पृष्ठ से लिंक करे गए पृष्ठ
  • अन्य कई लिंक भी उपलब्ध हैं, जैसे कि Quit Smoking
  • अधिक खोज के लिए गूगल पर “smoking cessation” या “quit smoking” टाइप करें, और सर्च रिज़ल्ट्स में से अधिकृत और विश्वसनीय साईट देखें, जैसे कि कैंसर संस्थानों के या सरकारी स्वास्थ्य विभाग के या शोधकर्ताओं के साईट.

डिमेंशिया और धूम्रपान के सम्बन्ध पर चर्चा:

अन्य कुछ लिंक

  • विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर जानकारी (World No Tobacco Day): अंग्रेज़ी विकिपीडिया पर पृष्ठ: World No Tobacco Day, विश्व स्वास्थ्य
    संस्थान के वेबसाइट पर पृष्ठ: World No Tobacco Day 2015
  • यदि आप Tobacco cessation clinic शुरू करना चाहते हैं तो बेंगलुरु के NIMHANS द्वारा उपलब्ध यह डाक्यूमेंट देखें/ डाउनलोड करें: Starting Tobacco Cessation Services

[ऊपर]

नोट: इस पृष्ठ पर जानकारी और लिंक सिर्फ आपकी सुविधा के लिए हैं; यह चिकित्सीय सलाह नहीं, और न ही किसी संसाधन को रेकोमेंड करा जा रहा है. किसी भी तरीके या संस्था की सच्चाई और उपयुक्तता को जांचना आपकी जिम्मेदारी है.

Alzheimer’s and the brain अल्ज़ाइमर रोग में मस्तिष्क के बदलाव: एक चित्रण

अल्ज़ाइमर रोग(Alzheimer’s Disease) डिमेंशिया (मनोभ्रंश) का एक आम कारण है. इस रोग में मस्तिष्क में किस प्रकार हानि होती है, और समय के साथ यह कैसे बढ़ती है, उसका एक चित्रण, National Institute on Aging के सौजन्य से:

Alzheimers disease-brain shrinkage

Late stage dementia care अंतिम अवस्था में डिमेंशिया देखभाल

late stage dementia patients are bedridden and fully dependent on caregivers

मेरी माँ का डिमेंशिया सफर कई सालों तक चला और आखिर के ढाई साल वे पूरी तरह बिस्तर पर ही थीं. इस अवस्था में देखभाल खासतौर पर मुश्किल होती हैं. वे चबा नहीं पाती थीं इसलिए हम उन्हें सूप, जूस, पतली दाल, छाछ देते. निगलने में दिक्कत थी इसलिए खयाल रखना होता था कि खाना पेट में ही जाए, गलती से फेफड़ों में न जाए. बेड सोर न हों इसलिए हर दो तीन घंटों में करवट बदलते थे. वे यह भी नहीं बता पाती थीं कि उन्हें क्या कहीं दर्द हो रहा है या कुछ तकलीफ है–हम इसका अंदाजा उनके हाव-भाव और शरीर हिलाने के तरीके से ही लगा पाते थे. उनको इस स्थिति में देखना बहुत मुश्किल हो जाता था.

कई देशों में इस अवस्था में देखभाल खास बनाए गए रिस्पाईट केयर (respite care) या ओल्ड एज होम (old age home) में होती है पर भारत में हम यह अंतिम चरण की देखभाल अपने घरों में ही करते हैं. देखभाल कैसे करें, इस विषय पर जानकारी आसानी से नहीं मिल पाती. क्योंकि डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति अपनी मर्जी बता नहीं पाते, देखभाल में अनेक चुनौतियों का सामना करना होता है. कई कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं.

इस विषय पर देखभाल करने वालों के लिए हिंदी में विस्तृत चर्चा का एक पृष्ठ: अग्रिम/ अंतिम अवस्था में देखभाल (Late-stage dementia care).


माँ की देखभाल के अंतिम चरण के मेरे निजी अनुभव मैंने विस्तार में अपने अंग्रेज़ी ब्लॉग पर इस श्रेणी में लिखे हैं: Late stage care.

My mother and wandering डिमेंशिया और माँ का भटकना

शुरू शुरू में जान-पहचान के लोग इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे कि मेरी माँ को कुछ दिक्कतें हो रही हैं, क्योंकि माँ अपनी दिक्कतों को छुपा पाती थीं. कभी कभी अगर कुछ कंफ्यूज़ भी हो जाती थीं, तो बात बदल देती थीं. चौबीस घंटे साथ रहने वालों को तो साफ पता चलता था कि उनमें काफी बदलाव है, पर दस पन्द्रह मिनट के लिए मिलने वालों को तो वे सामान्य ही दिखती थीं.

इसका नतीजा यह था कि उन्हें माँ से वैसी ही उम्मीद होती थी जैसे कि सालों पहले थी. और वे सोचते थे कि माँ की देखभाल भी वैसे ही होनी चाहिए जैसे अन्य बुजुर्गों की.

माँ के कमरे का एक दरवाजा सीधे घर के बाहर के कॉरिडोर में खुलता था. जब बाहर कोई चल रहा होता था या लोग आपस में बात करते हुए गुजारते थे, तो माँ अक्सर सोचती थीं कि कोई उन्हें बुला रहा है या कोई मिलने वाला आ रहा है. वे तुरंत उठकर दरवाजा खोलकर बाहर निकल जातीं. बाहर जाने के बाद कोई नज़र नहीं आता तो वे भूल जातीं कि किसलिए निकली थीं और इधर उधर टहलने लगतीं. गर्मी में धूप में, लू में घूमती रहतीं. सर्दी में बिना गरम कपड़ों के निकल जातीं. वे यह भूल जातीं कि उनका संतुलन ठीक नहीं था, और बिना किसी सहायता के सीढ़ियों से उतरने की कोशिश करतीं.

मुझे बहुत सतर्क रहना पड़ता था. दरवाजा खुलने की आवाज़ सुनते ही मैं भागती कि कहीं बाहर जाकर सीढ़ियों पर गिर न जाएँ, लू न लग जाए, ठंड न लग जाए. उन्हें बहला कर धीरे से वापस अंदर लाती. कभी कभी तो वे खुशी खुशी वापस आ जातीं, कभी जिद्द करतीं कि जरूर कोई मिलने आया था. मुझसे नाराज़ होने लगतीं कि मैं उन्हें लोगों से मिलने नहीं दे रही.

मैं समझाती कि कोई मिलने आएगा तो घंटी बजाएगा, ऐसे बिना मिले थोड़े ही चला जाएगा, आपको इतनी जल्दी दरवाजा खोलने की जरूरत नहीं है. मैं खोल दूंगी, आप क्यों परेशान होती हैं! वे कभी कभी समझ जातीं और मान भी लेतीं, पर फिर जब आवाज़ सुनतीं तो दरवाजे की तरफ लपकतीं. मैं अंदर से चटकनी लगाती तब भी वे उसे तेजी से खोल कर निकल जातीं. काफी बार हादसे होते होते बचे. एक दो बार उन्हें लू लग गयी और वे बीमार पड़ गयीं. मैं क्या करती? और नहीं सूझा तो मजबूरन मैंने उनके दरवाजे में अंदर से ताला लगाना शुरू कर दिया, यह बहाना बनाकर कि शहर में खून खराबे के वारदात बहुत बढ़ गए हैं, और बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए यह पुलिस का सुझाव है.

माँ तो शायद मान जातीं, पर जान पहचान वाले उन्हें उकसाने लगे. वे कहने लगे, आपकी बेटी ने तो आपको कैद कर रखा है, आप यह कैसे बर्दाश्त कर रही हैं. हम तो अपने बच्चों से ऐसी पाबंदी मंजूर नहीं करते. आप जब मर्जी जहाँ मर्जी बेझिझक जाइए, बेटी की बात मत सुनिए. वे मुझे भी डांटते, कहते तुम अपनी माँ को तंग कर रही हो.

मैंने उन लोगों को बताया कि माँ को डिमेंशिया है और वे भटक सकती हैं और खो सकती हैं. यह भी बताया कि माँ कैसे एक दो बार सीढ़ियों पर लुढ़कने वाली थीं. पर वे यही सोचते कि मैं बहाने बना रही हूँ या झूठ बोल रही हूँ. कहते यह डिमेंशिया विमेंशिया कुछ नहीं है, तुम्हारी माँ बिलकुल ठीक-ठाक हैं. तुम्हारा माँ के साथ सलूक गलत है.

इस उकसाने के कारण माँ मुझसे नाराज़ रहने लगीं. एक दिन मौका पा कर घर से फिर निकल गयीं, इस इरादे से कि वे अकेली बाजार जायेंगी. निकलने के बाद वे कुछ घबरा गयीं. सीढ़ियों के पास एक लड़का खड़ा था, उन्होंने उससे कहा कि उन्हें नीचे जाना है. लड़के ने उनकी मदद कर दी. फिर उन्होंने एक रिक्शा वाले को संकेत किया और कहा उन्हें बाजार जाना है. मुझे यह सब मालूम नहीं था. मैंने जब देखा माँ कमरे में नहीं हैं, तो ढूंढ़ना शुरू किया. यह तो शुक्र है कि एक जान-पहचान वाले ने देखा कि माँ अकेली हैं और घबराई हुई लग रही हैं, और उन्हें वापस ले आया, वरना तो यह सोच के दिल दहलता है कि क्या हो सकता था.

इस हादसे के बाद भी माँ के हमउम्र दोस्त यह मानने को तैयार नहीं थे कि माँ को कोई ऐसी तकलीफ थी जिससे उन्हें कंफ्यूशन रहता था, और उनकी सलाह माँ के लिए अनुचित थी. उनका उकसाना जारी रहा.

आखिरकार मैंने माँ के लिए दिन भर साथ रहने वाली एक आया को रखा, जो उनको साथ भी देती थी और यह भी ध्यान रख पाती थी कि माँ खुद को नुकसान न पहुचाएं. मैंने अन्य भी कुछ तरीके अपनाए जिनसे उनके भटकने की प्रवृत्ति कुछ कम हुई. यदि वे कंफ्यूशन के मारे बाहर निकलने की कोशिश करती तो भी हम उन्हें समय पर रोक पाते थे.

डिमेंशिया में भटकने की समस्या आम है, और अधिकाँश डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति में पायी जाती है. इस कारण मैंने इस विषय पर अपने सुझाव एक वीडियो में रिकार्ड करे हैं. शायद यह वीडियो आपके या आपके किसी जान-पहचान वाले के काम आये:

(यदि वीडियो प्लेयर नीचे लोड नहीं होता, तो आप इसे यूट्यूब पर यहाँ देख सकते हैं.

Looking after someone with dementia डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल: एक सरल, संक्षिप्त परिचय

जब परिवार में किसी को डिमेंशिया हो जाता है, तब व्यक्ति का व्यवहार बदल सकता है, व्यक्तित्व बदल सकता है, और काम करने की क्षमता भी बदलने लगती है. यादाश्त पर असर हो सकता है, समय और स्थान का बोध शायद ठीक न रहे. अन्य लक्षण भी पेश हो सकते हैं. इन सबसे व्यक्ति के दैनिक जीवन में दिक्कत होने लगती है. इस सबको देखकर परिवार वाले घबराने लगते हैं. उन्हें समझ में नहीं आता कि वे स्थिति से कैसे जूझें, और व्यक्ति की सहायता कैसे करें.

वैसे तो डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल करने के लिए बहुत कुछ सीखना और बदलना होता है, पर इतना सब कुछ कैसे सीखें, कैसे करें, यह सोच कर भी घबराहट होने लगती है.

कुछ महीने पहले मैंने डिमेंशिया देखभाल का एक सरल परिचय slideshare.net पर अपलोड करा है. यह एक संक्षिप्त विवरण है. नोट देखने के लिए आप इसे सीधे slideshare.net पर देख सकते हैं–क्लिक करें: डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल आप इसे नीचे दिए प्लयेर में भी देख सकते हैं.

देखभाल के तरीकों पर अधिक जानने के लिए आप मेरे वेबसाइट के पृष्ठ देख सकते हैं. वेबसाइट पर देखभाल के सब पहलूओं पर जानकारी और चर्चा है, जैसे कि देखभाल का रोल क्या है, व्यक्ति के लिए घर कैसे बदलें, व्यक्ति से बातचीत कैसे करें, उनकी मदद कैसे करें, वगैरह.

वेबसाइट के लिए यहाँ क्लिक करें

वेबसाइट के देखभाल संबंधी पृष्ठों के लिए क्लिक करें: देखभाल करने वालों के लिए (Caring for dementia patients)

Hindi video: Caregiving for my mother डिमेंशिया से ग्रस्त माँ की देखभाल: मेरे अनुभव (वीडियो)

डिमेंशिया के कारण मेरी माँ को अनेक प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ा और उन्हें सहायता की जरूरत होती थी. देखभाल का सिलसिला कई साल चला. हाल में मैंने माँ के डिमेंशिया के सफर और उनकी देखभाल पर दो हिंदी वीडियो बनाए थे. माँ के डिमेंशिया के सफर वाले वीडियो के बारे में तो मैं पहले एक पोस्ट लिख चुकी हूँ. इस पोस्ट में देखें मेरे देखभाल संबंधी अनुभव पर एक वीडियो:

(प्लेयर ठीक से न चले तो आप वीडियो सीधे यूट्यूब पर देख सकते हैं, यहाँ क्लिक करें: Caregiving for my mother (डिमेंशिया से ग्रस्त माँ की देखभाल: मेरे अनुभव))

मेरे अंग्रेज़ी ब्लॉग पर इस विषय पर पोस्ट देखना चाहें तो लिंक नीचे हैं:

अंग्रेज़ी ब्लॉग: click here for my English blog

माँ के डिमेंशिया और संबंधित देखभाल के मेरे अनुभव पर लिखे मेरे ब्लॉग पोस्ट अनेक श्रेणियों में हैं. इन श्रेणियों के लिंक: Dementia Diagnosis, Living with dementia, Challenging Behavior, People around us, Adapting home and life, और Late stage care.

Hindi video: My mother’s dementia journey माँ का डिमेंशिया का सफर (वीडियो)

मेरी माँ को डिमेंशिया था. उनके डिमेंशिया के लंबे सफर में मैं उनके साथ थी, और उस दौरान के अनुभव मैंने अपने अंग्रेज़ी ब्लॉग में अनेक ब्लॉग पोस्ट में बांटे हैं. हाल ही में मैंने माँ के डिमेंशिया के सफर और उनकी देखभाल पर दो हिंदी वीडियो भी बनाए हैं, और ये यूट्यूब पर उपलब्ध हैं.

माँ के डिमेंशिया के अनुभव पर मेरा वीडियो नीचे देखें:

(प्लेयर ठीक से न चले तो आप वीडियो सीधे यूट्यूब पर देख सकते हैं, यहाँ क्लिक करें: My mother’s dementia journey (माँ का डिमेंशिया का सफर)this youtube link directly)

मेरे अंग्रेज़ी ब्लॉग पर इस विषय पर पोस्ट देखना चाहें तो लिंक नीचे हैं:

अंग्रेज़ी ब्लॉग: click here for my English blog

माँ के डिमेंशिया के, और डिमेंशिया संबंधित देखभाल के मेरे अनुभव के अंग्रेज़ी ब्लॉग पोस्ट अनेक श्रेणियों में हैं. इनके लिंक: Dementia Diagnosis, Living with dementia, Challenging Behavior, People around us, Adapting home and life, और Late stage care.