Tag Archives: अल्ज़ाइमर

हम डिमेंशिया/ अल्ज़ाइमर से कैसे बच सकते हैं?

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के शुरू के लक्षण मंद होते हैं, पर आगे जाकर व्यक्ति में कई गंभीर और चिंताजनक लक्षण नजर आते हैं, जिन का डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के जीवन के हरेक पहलू पर असर होता है. अंतिम चरण में तो व्यक्ति अकसर बिस्तर पर ही होते हैं और हर काम के लिए निर्भर होते हैं.

डिमेंशिया/ अल्ज़ाइमर की गंभीरता पहचानने वाले अकसर पूछते हैं कि यह किसे होता है, क्यों होता है, और हम इससे कैसे बच सकते हैं. डिमेंशिया के लक्षण अनेक रोगों से पैदा हो सकते हैं (अल्ज़ाइमर इन में मुख्य है). अब तक वैज्ञानिकों को डिमेंशिया का कोई पक्का कारण नहीं पता, और न ही उन्हें इस से बचने का कोई पक्का तरीका मालूम है, पर हम डिमेंशिया के जोखिम कारकों को जानते हैं. और हम अपनी जीवन शैली में कुछ बदलाव करके अपनी डिमेंशिया की संभावना को कम कर सकते हैं.

इस हिंदी प्रेजेंटेशन में देखिये डिमेंशिया किसे हो सकता है, इस के जोखिम कारक क्या हैं, और आप इस की संभावना कम करने के लिए क्या कर सकते हैं. यह प्रस्तुति अब तक के शोध पर आधारित है और इस में अनेक ऐसे कारगर उपाय हैं, जिन से डिमेंशिया की संभावना के साथ-साथ अन्य कई स्वास्थ्य समस्याओं की संभावना भी कम होगी. इस प्रेजेंटेशन में उदाहरण और चित्र भी हैं.

हिंदी में इसे स्लाईड शेयर (Slideshare) पर देखें — यदि प्लेयर नीचे लोड न हो रहा हो तो यहाँ क्लिक करें: डिमेंशिया/ अल्ज़ाइमर से कैसे बचें?

.

Advertisements

डिमेंशिया: एक गंभीर समस्या (सिर्फ “भूलने” की बीमारी नहीं)

अकसर लोग डिमेंशिया को सिर्फ एक भूलने की बीमारी के नाम से जानते हैं. वे सोचते हैं कि याददाश्त की समस्या ही डिमेंशिया का एकमात्र या प्रमुख लक्षण है. पर याददाश्त की समस्या तो डिमेंशिया के लक्षणों में से सिर्फ एक है– डिमेंशिया के अनेक गंभीर और चिंताजनक लक्षण होते हैं, जिन का डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के जीवन के हरेक पहलू पर असर होता है. व्यक्ति को अपने साधारण दैनिक कार्यों में दिक्कतें होती हैं, और ये दिक्कतें समय के साथ बढ़ती जाती हैं. सहायता की जरूरत भी बढ़ती जाती है, और देखभाल का काम मुश्किल होता जाता है.

इस हिंदी प्रेजेंटेशन में देखिये डिमेंशिया क्या है, इस में मस्तिष्क में कैसी हानि होती है, लक्षण क्या हैं, और समय के साथ क्या होता है, और यह किस किस प्रकार का हो सकता है. इस के इलाज संभव हैं या नहीं, और इस की संभावना कम करने के लिए डॉक्टर क्या सुझाव देते हैं, इस पर भी स्लाइड हैं. देखभाल करने वालों को क्या करना होता है, इस पर चर्चा देखिये. इस प्रेजेंटेशन में उदाहरण और चित्र भी हैं.

हिंदी में इसे स्लाईड शेयर (Slideshare) पर देखें — यदि प्लेयर नीचे लोड न हो रहा हो तो यहाँ क्लिक करें: डिमेंशिया क्या है?(What is Dementia)

.

डिमेंशिया के मुख्य प्रकार (भाग 4): अल्ज़ाइमर रोग

डिमेंशिया के लक्षण कई रोगों के कारण हो सकते हैं। अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) सबसे ज्यादा पाया जाने वाला डिमेंशिया रोग है। यह माना जाता है कि अल्जाइमर रोग डिमेंशिया के करीब 50-75% केस के लिए जिम्मेदार है। यह अकेले भी पाया जाता है, और अन्य डिमेंशिया के साथ भी मौजूद हो सकता है (जैसे कि संवहनी मनोभ्रंश या लुई बॉडी डिमेंशिया के साथ)।

[यह पोस्ट अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) : एक परिचय पृष्ठ का एक संक्षिप्त संस्करण है।]

अल्ज़ाइमर रोग में मस्तिष्क में हानि होती है-मस्तिष्क में न्यूरोफिब्रिलरी टैंगिल और बीटा-एमीलायड प्लैक देखे जाते हैं, और मस्तिष्क सिकुड़ने लगता है. मस्तिष्क की हानि के कारण व्यक्ति में लक्षण नजर आते हैं। शुरू में ये लक्षण हलके होते हैं और कई बार लोग इन पर ध्यान नहीं देते। सबसे आम प्रारंभिक लक्षण है याददाश्त की समस्या। इस लिए इस रोग को कई लोग “भूलने की बीमारी”, “स्मृति-लोप” और “याददाश्त की समस्या” के नाम से भी जाना जाता है। शुरू में अन्य भी कई लक्षण होते हैं, जैसे की अवसाद, अरुचि, समय और स्थान का सही बोध न होना, वगैरह।

अल्ज़ाइमर रोग एक प्रगतिशील रोग है, और इस में हो रही मस्तिष्क में हानि समय के साथ बढ़ती जाती है। लक्षण भी गंभीर होते जाते हैं। व्यक्ति को सभी कामों में दिक्कत होने लगती है। रोग के अंतिम चरण में व्यक्ति अधिकाँश समय बिस्तर पर ही रहते हैं और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं।

mantra image

अल्ज़ाइमर रोग किसी को भी हो सकता है। यह बड़ी उम्र के लोगों में अधिक देखा जाता है, पर कम उम्र में भी हो सकता है।

अफ़सोस, अल्ज़ाइमररोग लाइलाज है। इस को रोकने या ठीक करने के लिए दवा नहीं है। पर कुछ दवा और गैर-दवा वाले उपचार से लक्षणों से कुछ राहत मिल पाती है।

इस रोग से बचने के लिए कोई पक्का तरीका मालूम नहीं है, पर यह माना जाता है कि स्वस्थ और सक्रिय जीवन शैली से इस की संभावना कुछ कम हो सकती है। हृदय स्वास्थ्य के लिए जो कदम उपयोगी है, वे इस से बचाव में भी उपयोगी हैं (What is good for the heart is good for the brain)।

यह पोस्ट अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) : एक परिचय पृष्ठ का एक संक्षिप्त संस्करण है। अल्ज़ाइमर रोग पर अधिक जानकारी के लिए और अन्य संसाधन के लिए क्लिक करें: अल्ज़ाइमर रोग(Alzheimer’s Disease, AD) : एक परिचय पृष्ठ — इस पृष्ठ पर चर्चा के विषय हैं: अल्ज़ाइमर रोग क्या है, इस के लक्षण क्या हैं, यह समय के साथ कैसे बिगड़ता है, यह किसे हो सकता है, रोग-निदान और उपचार, यह किसे हो सकता है, उम्र और इस रोग के बीच का सम्बन्ध, अब तक ज्ञात कारक, रोग की अवधि, और अधिक जानकारी और सपोर्ट के लिए उपलब्ध संसाधन।

अन्य प्रमुख प्रकार के डिमेंशिया पर भी हिंदी पृष्ठ देखें:


ब्लॉग एंट्री शेयर करने के लिए नीचे दिए बटन का इस्तेमाल करें. धन्यवाद!

भारत में डिमेंशिया, 2015: भविष्य के लिए अनुमान

समय के साथ साथ भारत में डिमेंशिया (मनोभ्रंश) से ग्रस्त लोगों की संख्या बढ़ रही है और परिवारों पर डिमेंशिया और सम्बंधित देखभाल का असर भी बढ़ रहा है.

भारत में वृद्धों की संख्या बढ़ रही है. लोग दीर्घायु हो रहे हैं. 1950-55 में जन्म पर जीवन प्रत्याशा सिर्फ 36.62 साल थी, पर 2010-2015 में यह बढ़कर 67.47 हो गयी है और अनुमान है कि 2045-2040 तक यह 75.87 साल होगी. नतीजतन, कुल आबादी में 60+ आयु वाले लोगों का प्रतिशत भी बढ़ेगा. 2015 में यह 8.9% है, और अनुमान है कि 2050 में यह अनुपात 19.4% हो जाएगा. यह इतना बड़ा फर्क है कि अपने चारों तरफ देखने से स्पष्ट होगा कि आबादी में वृद्ध लोग ज्यादा हैं. कुछ लोग इस तथ्य को “India is greying” या “India is ageing” कह कर व्यक्त करते हैं (“भारत बूढ़ा हो रहा है”).

उम्र बढ़ने पर डिमेंशिया होने का खतरा भी बढ़ जाता है. हर 6.6 साल उम्र बढ़ने से डिमेंशिया का खतरा दुगना हो जाता है. 60 साल से कम उम्र के लोगों में डिमेंशिया बहुत ही कम पाया जाता है. आयु वर्ग 60-65 में 1.9% लोगों में डिमेंशिया पाया जाता है, पर 85-89 आयु वर्ग में अनुमान है कि 23% लोगों को डिमेंशिया होता है, और 90+ आयु वर्ग में तो यह 44.1% है.

दोनों बातों को जोड़ें तो स्थिति की गंभीरता और स्पष्ट नज़र आने लगती है. हमारी आबादी में वृद्ध लोगों की संख्या और अनुपात बढ़ रहे हैं, और वृद्ध लोगों को डिमेंशिया होने का ज्यादा खतरा है. वर्ष 2050 के लिए अनुमान है कि डिमेंशिया से ग्रस्त लोग तकरीबन 133.3 लाख होंगे, जो वर्तमान के मुकाबले 225% की वृद्धि है. इसके मुकाबले कुल आबादी सिर्फ 30% बढ़ेगी. यानि कि अधिक परिवारों में डिमेंशिया वाले व्यक्ति होंगे, और डिमेंशिया संबंधी सहायता और सेवाओं की जरूरत बहुत बढ़ेगी.

भविष्य में भारत में डिमेंशिया कितना अधिक होगा, इसका चित्रण नीचे देखें. यह चित्र एक चार-भाग वाले इन्फोग्राफिक का तीसरा भाग है.

dementia-india-2015-infographic-future-estimates-hindi

ब्लॉग पोस्ट से संबंधित कुछ लिंक

ब्लॉग एंट्री शेयर करने के लिए नीचे दिए बटन का इस्तेमाल करें. आपके कमेंट भी आमंत्रित हैं. धन्यवाद!

विश्व अल्ज़ाइमर दिवस 2015 के अवसर पर डिमेंशिया देखभाल पर कुछ विचार

दुनिया भर में सितम्बर का महीना “विश्व अल्ज़ाइमर माह” (World Alzheimer’s Month) के रूप में मनाया जाता है, और सितम्बर 21 “विश्व अल्ज़ाइमर दिवस” (World Alzheimer’s Day) के रूप में मनाया जाता है. (अल्जाइमर रोग डिमेंशिया के लक्षण पैदा करने वाले रोगों में मुख्य है). इस महीने विशेषज्ञ और स्वयंसेवक अनेक कार्यक्रमों द्वारा डिमेंशिया और संबंधित देखभाल के बारे में जानकारी फैलाने का खास प्रयत्न करते हैं. अखबारों और पत्रिकाओं में भी डिमेंशिया पर लेख प्रकाशित होते हैं. इस ब्लॉग पोस्ट द्वारा मैं भी डिमेंशिया देखभाल के बारे में कुछ बांटना चाहती हूँ.

यदि आप डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं तो आप शायद अन्य देखभाल करने वाले परिवारों के अनुभव जानना चाहते होंगे. आप यह जानना चाहते होंगे कि आपके प्रियजन को किस प्रकार की समस्याएँ हो सकती है, देखभाल के क्या तरीके हैं, लोग तनाव से कैसे बचते हैं, देखभाल की योजना कैसे बनाते हैं.

यूं समझिए, डिमेंशिया देखभाल एक सालों लंबा सफर है. परिवार वालों को व्यक्ति की समस्याएं समझने में समय लगता है. स्थिति स्वीकारने में, और उचित सहायता के तरीके ढूंढ़ने में और बदलाव करने में टाइम लगता है, मेहनत करनी पड़ती है. गलतियों होती हैं, निराशा होती है, एक दूसरे पर गुस्सा आता है. धीरे धीरे हालत सुधरने लगती है और परिवार वाले सोचते हैं कि शुक्र है, अब तो सब ठीक-ठाक चलने लगा है. फिर व्यक्ति का डिमेंशिया कुछ नई समस्या पैदा कर देता है, हालत और बिगड़ जाती है. परिवार वालों को समझने और तरीके ढूंढ़ने का सिलसिला फिर शुरू करना पड़ता है. देखभाल के इस सफर में उतार-चढ़ाव होते ही रहते हैं. और हर परिवार में स्थिति और उपाय अलग होते हैं.

अन्य परिवारों के देखभाल संबंधी अनुभव जानने से फायदा हो सकता है, पर ऐसे अनुभव जान पाना आसान नहीं है.

किसी देखभाल कर्ता से पूछें कि देखभाल करने का आपका अनुभव क्या है, तो वे वही कहेंगे जो उन्हें उस पल याद आता है, और जो वे बेझिझक बाँट सकते हैं. सालों-साल चलने वाले डिमेंशिया का निचोड़ यकायक चंद वाक्य में कोई कैसे दे! स्वाभाविक है कि कई लोग हाल में हुई घटनाओं पर या अभी हो रही समस्याओं पर बात करेंगे. एक महीने बाद यदि आप उन से फिर पूछें, तो वे शायद उस घटना का जिक्र ही न करें, या किसी नई समस्या के बारे में बात करें, जो अब उन्हें परेशान कर रही है. डिमेंशिया किस अवस्था में है, परिवार का अनुभव इस पर निर्भर है. डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति शुरूआती अवस्था में हो तो परिवार वाले कुछ कहेंगे, और अंतिम अवस्था हो तो कुछ और कहेंगे.

शर्म और झिझक अनुभव बांटने में बाधा पैदा करते हैं. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो लोग दूसरों को इसलिए नहीं बताएँगे क्योंकि उन्हें शर्म आती है, या उन्हें लगता है कि सुनने वाले उनकी निंदा करेंगे या उन्हें हीन या नालायक समझेंगे. खुल कर लोग तभी बात कर पाते हैं जब कि माहौल उन्हें सुरक्षित लगे और उन्हें भरोसा हो कि कोई उनकी बात लेकर उनकी निंदा नहीं करेगा.

सब परिवारों के अनुभव अलग होते हैं. यदि यह जानना हो कि डिमेंशिया में किस किस तरह के अनुभव हो सकते है तो कई लोगों से बात करनी होगी. सिर्फ एक या दो प्रकाशित लेखों को पढ़कर आपको सही और पूरी जानकारी नहीं मिल सकती. ये लेख कुछ परिवारों के कुछ अनुभव प्रस्तुत करते हैं. लेख आपके लिए कितना उपयोगी है यह इस पर निर्भर है कि रिपोर्टर ने किस इरादे से लेख लिखा है. और लेख में जो पेश है वह सिर्फ एक झलक है, क्योंकि रिपोर्टर ने तो सिर्फ कुछ परिवार चुने हैं, और उनकी बातों से सिर्फ वे कुछ अंश चुने हैं जो लेख में फिट हो रहे थे. वैसे भी कई लोग इंटरव्यू में खुल कर नहीं बोलते. शायद आप के लिए जिन देखभाल करने वालों के अनुभव उपयोगी हो सकते थे उनका इंटरव्यू न हुआ हो. शायद लेख में जो प्रस्तुत है वह अंश आपके मतलब का न हो, या आपको गलत जानकारी दे.

यदि आपको डिमेंशिया के अनुभवों के बारे में ठीक से जानकारी चाहिए तो आपको अनेक परिवारों की कहानियाँ जाननी होंगे. लेख, किताबें, ब्लॉग पढ़ने होंगे. अन्य देखभाल करने वालों से बात करनी होगी. अपनी कहानी बांटनी होगे, और दूसरों की कहानी सुननी होगी. समर्थक समुदाय में भाग लेना होगा. जितने ज्यादा परिवार वाले आपस में खुल कर बात करें, उतना ही अच्छा होगा. समुदाय के तौर पर हम सभी एक दूसरे की मदद कर सकते हैं, समर्थन दे सकते हैं.

मैं भी कई साल तक देखभाल कर्ता रह चुकी हूँ. अपने निजी अनुभव से मैं जानती हूँ कि डिमेंशिया और देखभाल के सफर में उचित जानकारी से देखभाल आसान और कारगर हो सकती है, और तनाव और अकेलापन भी कम हो जाता है. दूसरों के किस्से सुनने से मुझे माँ के डिमेंशिया को स्वीकारने में आसानी हुई थी, और उपयोगी सुझाव भी मिले थे. मैंने भी अपने अनुभव खुल कर ब्लॉग और वीडियो द्वारा बांटे हैं. और अपने डिमेंशिया वेबसाइट पर मैंने अनेक देखभाल करने वालों के विस्तृत इंटरव्यू प्रकाशित करे हैं. अखबारों में और अन्य ब्लॉग और साईट पर उपलब्ध देखभाल की कहानियों के लिंक भी एकत्रित करे हैं. डिमेंशिया देखभाल के क्षेत्र में यह मेरा एक योगदान है. कुछ लिंक:

Alzheimer’s and the brain अल्ज़ाइमर रोग में मस्तिष्क के बदलाव: एक चित्रण

अल्ज़ाइमर रोग(Alzheimer’s Disease) डिमेंशिया (मनोभ्रंश) का एक आम कारण है. इस रोग में मस्तिष्क में किस प्रकार हानि होती है, और समय के साथ यह कैसे बढ़ती है, उसका एक चित्रण, National Institute on Aging के सौजन्य से:

Alzheimers disease-brain shrinkage

Can we protect ourselves from dementia क्या हम डिमेंशिया से सुरक्षित रह सकते हैं?

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) की डरावनी सचाई के बारे में सुनते हैं तो हम यह जानना चाहते हैं कि क्या इससे बचा जा सकता है.

अखबारों में और टीवी प्रोग्राम में हम देखते और सुनते हैं कि कुछ तरीके हैं जिनसे हम डिमेंशिया से बचे रह सकते हैं. कुछ लेखों में स्वस्थ जीवन शैली के सुझाव होते हैं, कुछ में अन्य सुझाव होते हैं. सवाल यह है कि ये उपाय हमें सुरक्षित रखने में किस हद तक कारगर हो सकते हैं.

तो संक्षेप में कुछ उत्तर:

  • क्या हम अपने जीवन में कुछ ऐसे बदलाव कर सकते हैं या कुछ ऐसे कदम उठा सकते हैं जो डिमेंशिया का खतरा कम करेंगे?…..हाँ!!
  • और क्या इन कदमों से हम शत-प्रतिशत डिमेंशिया से बच जायेंगे?….. नहीं, .विशेषज्ञों का ऐसा कोई दावा नहीं है.

सच तो यह है कि फिलहाल डिमेंशिया की जानकारी इतनी पक्की नहीं है कि हम यह कह पाएँ कि यह कदम उठायें तो यह निश्चित है कि डिमेंशिया नहीं होगा. जो तरीके सुझाए जाते हैं, वे डिमेंशिया पैदा होने की संभावना कम कर सकते हैं, पर हम पूरी तरह से डिमेंशिया से बचे रहेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है. वर्तमान उपलब्ध सुझाव सब Risk reduction के तरीके हैं, सम्पूर्ण सुरक्षा के (zero-risk) तरीके नहीं.

एक अन्य पहलू यह है कि डिमेंशिया के लक्षण अनेक बीमारियों के कारण पैदा हो सकते हैं. अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease) इन बीमारियों में प्रमुख है, पर डिमेंशिया पैदा करने वाली बीमारियों की संख्या तकरीबन पचास से सौ हैं. ये बीमारियों क्यों होती हैं, और इनसे कैसे बचें, ये अब भी शोध के विषय हैं.

यदि हम यह चाहें कि डिमेंशिया के सभी प्रकार से सुरक्षित रहें, तो इसका मतलब है हमें हरेक डिमेंशिया रोग से सुरक्षित रहना होगा. इसके लिए जरूरी जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है.

विशेषज्ञों की सिफारिश है कि हम हम डिमेंशिया से बचाव के सुझाव अपनाएँ. गौर-तलब है कि डिमेंशिया के खतरे को कम करने के लिए जो सुझाव दिए जाते हैं वे अक्सर जीवन शैली सम्बंधित हैं. उनको अपनाने से अन्य रोगों की संभावना भी कम होगी. उदाहरण: नियमित व्यायाम का सुझाव तो डॉक्टर मधुमेह (diabetes) और उच्च रक्त-चाप (high blood pressure) से बचने के लिए भी देते हैं. बढ़ती उम्र के बावजूद हम स्वस्थ, सक्रिय और खुश रह पाएँ, इसकी संभावना बढ़ाने के लिए इन बचाव के तरीकों को अपनाना अकलमंदी है.

पर एक बात का खयाल रखें….

यदि किसी को डिमेंशिया हो, तो यह न सोचें कि व्यक्ति ने अपने स्वास्थ्य का खयाल नहीं रखा होगा. डिमेंशिया का होना किसी लापरवाही का नतीजा कतई नहीं है. सच तो यह है कि डिमेंशिया क्यों होता है, किसे होता है, कब हो सकता है, इस सब की समझ अभी बहुत कच्ची और अधूरी है. उत्तम जीवन शैली अपनाने वालों को भी डिमेंशिया हो सकता है.

एक अन्य पहलू यह है कि अच्छी जीवन शैली अपनाने के बाद भी हमें डिमेंशिया के लक्षणों के प्रति सचेत रहना होगा. यदि हम डिमेंशिया के कुछ लक्षण देखें तो डॉक्टर से सलाह करना उचित होगा. यह मत सोचिये कि भई, हम तो पूरी सावधानी से जी रहे थे, हमें कुछ नहीं हो सकता. अपनी तरफ से पूरी कोशिश के बावजूद हमें डिमेंशिया हो सकता है. स्वयं को दोष न दें, न ही अपने में हो रहे बदलाव को नकारें. डॉक्टर से यथा-उचित सलाह कर.