हम डिमेंशिया/ अल्ज़ाइमर से कैसे बच सकते हैं?

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के शुरू के लक्षण मंद होते हैं, पर आगे जाकर व्यक्ति में कई गंभीर और चिंताजनक लक्षण नजर आते हैं, जिन का डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के जीवन के हरेक पहलू पर असर होता है. अंतिम चरण में तो व्यक्ति अकसर बिस्तर पर ही होते हैं और हर काम के लिए निर्भर होते हैं.

डिमेंशिया/ अल्ज़ाइमर की गंभीरता पहचानने वाले अकसर पूछते हैं कि यह किसे होता है, क्यों होता है, और हम इससे कैसे बच सकते हैं. डिमेंशिया के लक्षण अनेक रोगों से पैदा हो सकते हैं (अल्ज़ाइमर इन में मुख्य है). अब तक वैज्ञानिकों को डिमेंशिया का कोई पक्का कारण नहीं पता, और न ही उन्हें इस से बचने का कोई पक्का तरीका मालूम है, पर हम डिमेंशिया के जोखिम कारकों को जानते हैं. और हम अपनी जीवन शैली में कुछ बदलाव करके अपनी डिमेंशिया की संभावना को कम कर सकते हैं.

इस हिंदी प्रेजेंटेशन में देखिये डिमेंशिया किसे हो सकता है, इस के जोखिम कारक क्या हैं, और आप इस की संभावना कम करने के लिए क्या कर सकते हैं. यह प्रस्तुति अब तक के शोध पर आधारित है और इस में अनेक ऐसे कारगर उपाय हैं, जिन से डिमेंशिया की संभावना के साथ-साथ अन्य कई स्वास्थ्य समस्याओं की संभावना भी कम होगी. इस प्रेजेंटेशन में उदाहरण और चित्र भी हैं.

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डिमेंशिया: एक गंभीर समस्या (सिर्फ “भूलने” की बीमारी नहीं)

अकसर लोग डिमेंशिया को सिर्फ एक भूलने की बीमारी के नाम से जानते हैं. वे सोचते हैं कि याददाश्त की समस्या ही डिमेंशिया का एकमात्र या प्रमुख लक्षण है. पर याददाश्त की समस्या तो डिमेंशिया के लक्षणों में से सिर्फ एक है– डिमेंशिया के अनेक गंभीर और चिंताजनक लक्षण होते हैं, जिन का डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के जीवन के हरेक पहलू पर असर होता है. व्यक्ति को अपने साधारण दैनिक कार्यों में दिक्कतें होती हैं, और ये दिक्कतें समय के साथ बढ़ती जाती हैं. सहायता की जरूरत भी बढ़ती जाती है, और देखभाल का काम मुश्किल होता जाता है.

इस हिंदी प्रेजेंटेशन में देखिये डिमेंशिया क्या है, इस में मस्तिष्क में कैसी हानि होती है, लक्षण क्या हैं, और समय के साथ क्या होता है, और यह किस किस प्रकार का हो सकता है. इस के इलाज संभव हैं या नहीं, और इस की संभावना कम करने के लिए डॉक्टर क्या सुझाव देते हैं, इस पर भी स्लाइड हैं. देखभाल करने वालों को क्या करना होता है, इस पर चर्चा देखिये. इस प्रेजेंटेशन में उदाहरण और चित्र भी हैं.

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डिमेंशिया के मुख्य प्रकार (भाग 4): अल्ज़ाइमर रोग

डिमेंशिया के लक्षण कई रोगों के कारण हो सकते हैं। अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) सबसे ज्यादा पाया जाने वाला डिमेंशिया रोग है। यह माना जाता है कि अल्जाइमर रोग डिमेंशिया के करीब 50-75% केस के लिए जिम्मेदार है। यह अकेले भी पाया जाता है, और अन्य डिमेंशिया के साथ भी मौजूद हो सकता है (जैसे कि संवहनी मनोभ्रंश या लुई बॉडी डिमेंशिया के साथ)।

[यह पोस्ट अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) : एक परिचय पृष्ठ का एक संक्षिप्त संस्करण है।]

अल्ज़ाइमर रोग में मस्तिष्क में हानि होती है-मस्तिष्क में न्यूरोफिब्रिलरी टैंगिल और बीटा-एमीलायड प्लैक देखे जाते हैं, और मस्तिष्क सिकुड़ने लगता है. मस्तिष्क की हानि के कारण व्यक्ति में लक्षण नजर आते हैं। शुरू में ये लक्षण हलके होते हैं और कई बार लोग इन पर ध्यान नहीं देते। सबसे आम प्रारंभिक लक्षण है याददाश्त की समस्या। इस लिए इस रोग को कई लोग “भूलने की बीमारी”, “स्मृति-लोप” और “याददाश्त की समस्या” के नाम से भी जाना जाता है। शुरू में अन्य भी कई लक्षण होते हैं, जैसे की अवसाद, अरुचि, समय और स्थान का सही बोध न होना, वगैरह।

अल्ज़ाइमर रोग एक प्रगतिशील रोग है, और इस में हो रही मस्तिष्क में हानि समय के साथ बढ़ती जाती है। लक्षण भी गंभीर होते जाते हैं। व्यक्ति को सभी कामों में दिक्कत होने लगती है। रोग के अंतिम चरण में व्यक्ति अधिकाँश समय बिस्तर पर ही रहते हैं और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं।

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अल्ज़ाइमर रोग किसी को भी हो सकता है। यह बड़ी उम्र के लोगों में अधिक देखा जाता है, पर कम उम्र में भी हो सकता है।

अफ़सोस, अल्ज़ाइमररोग लाइलाज है। इस को रोकने या ठीक करने के लिए दवा नहीं है। पर कुछ दवा और गैर-दवा वाले उपचार से लक्षणों से कुछ राहत मिल पाती है।

इस रोग से बचने के लिए कोई पक्का तरीका मालूम नहीं है, पर यह माना जाता है कि स्वस्थ और सक्रिय जीवन शैली से इस की संभावना कुछ कम हो सकती है। हृदय स्वास्थ्य के लिए जो कदम उपयोगी है, वे इस से बचाव में भी उपयोगी हैं (What is good for the heart is good for the brain)।

यह पोस्ट अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) : एक परिचय पृष्ठ का एक संक्षिप्त संस्करण है। अल्ज़ाइमर रोग पर अधिक जानकारी के लिए और अन्य संसाधन के लिए क्लिक करें: अल्ज़ाइमर रोग(Alzheimer’s Disease, AD) : एक परिचय पृष्ठ — इस पृष्ठ पर चर्चा के विषय हैं: अल्ज़ाइमर रोग क्या है, इस के लक्षण क्या हैं, यह समय के साथ कैसे बिगड़ता है, यह किसे हो सकता है, रोग-निदान और उपचार, यह किसे हो सकता है, उम्र और इस रोग के बीच का सम्बन्ध, अब तक ज्ञात कारक, रोग की अवधि, और अधिक जानकारी और सपोर्ट के लिए उपलब्ध संसाधन।

अन्य प्रमुख प्रकार के डिमेंशिया पर भी हिंदी पृष्ठ देखें:


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भारत में डिमेंशिया, 2015: भविष्य के लिए अनुमान

समय के साथ साथ भारत में डिमेंशिया (मनोभ्रंश) से ग्रस्त लोगों की संख्या बढ़ रही है और परिवारों पर डिमेंशिया और सम्बंधित देखभाल का असर भी बढ़ रहा है.

भारत में वृद्धों की संख्या बढ़ रही है. लोग दीर्घायु हो रहे हैं. 1950-55 में जन्म पर जीवन प्रत्याशा सिर्फ 36.62 साल थी, पर 2010-2015 में यह बढ़कर 67.47 हो गयी है और अनुमान है कि 2045-2040 तक यह 75.87 साल होगी. नतीजतन, कुल आबादी में 60+ आयु वाले लोगों का प्रतिशत भी बढ़ेगा. 2015 में यह 8.9% है, और अनुमान है कि 2050 में यह अनुपात 19.4% हो जाएगा. यह इतना बड़ा फर्क है कि अपने चारों तरफ देखने से स्पष्ट होगा कि आबादी में वृद्ध लोग ज्यादा हैं. कुछ लोग इस तथ्य को “India is greying” या “India is ageing” कह कर व्यक्त करते हैं (“भारत बूढ़ा हो रहा है”).

उम्र बढ़ने पर डिमेंशिया होने का खतरा भी बढ़ जाता है. हर 6.6 साल उम्र बढ़ने से डिमेंशिया का खतरा दुगना हो जाता है. 60 साल से कम उम्र के लोगों में डिमेंशिया बहुत ही कम पाया जाता है. आयु वर्ग 60-65 में 1.9% लोगों में डिमेंशिया पाया जाता है, पर 85-89 आयु वर्ग में अनुमान है कि 23% लोगों को डिमेंशिया होता है, और 90+ आयु वर्ग में तो यह 44.1% है.

दोनों बातों को जोड़ें तो स्थिति की गंभीरता और स्पष्ट नज़र आने लगती है. हमारी आबादी में वृद्ध लोगों की संख्या और अनुपात बढ़ रहे हैं, और वृद्ध लोगों को डिमेंशिया होने का ज्यादा खतरा है. वर्ष 2050 के लिए अनुमान है कि डिमेंशिया से ग्रस्त लोग तकरीबन 133.3 लाख होंगे, जो वर्तमान के मुकाबले 225% की वृद्धि है. इसके मुकाबले कुल आबादी सिर्फ 30% बढ़ेगी. यानि कि अधिक परिवारों में डिमेंशिया वाले व्यक्ति होंगे, और डिमेंशिया संबंधी सहायता और सेवाओं की जरूरत बहुत बढ़ेगी.

भविष्य में भारत में डिमेंशिया कितना अधिक होगा, इसका चित्रण नीचे देखें. यह चित्र एक चार-भाग वाले इन्फोग्राफिक का तीसरा भाग है.

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ब्लॉग पोस्ट से संबंधित कुछ लिंक

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विश्व अल्ज़ाइमर दिवस 2015 के अवसर पर डिमेंशिया देखभाल पर कुछ विचार

दुनिया भर में सितम्बर का महीना “विश्व अल्ज़ाइमर माह” (World Alzheimer’s Month) के रूप में मनाया जाता है, और सितम्बर 21 “विश्व अल्ज़ाइमर दिवस” (World Alzheimer’s Day) के रूप में मनाया जाता है. (अल्जाइमर रोग डिमेंशिया के लक्षण पैदा करने वाले रोगों में मुख्य है). इस महीने विशेषज्ञ और स्वयंसेवक अनेक कार्यक्रमों द्वारा डिमेंशिया और संबंधित देखभाल के बारे में जानकारी फैलाने का खास प्रयत्न करते हैं. अखबारों और पत्रिकाओं में भी डिमेंशिया पर लेख प्रकाशित होते हैं. इस ब्लॉग पोस्ट द्वारा मैं भी डिमेंशिया देखभाल के बारे में कुछ बांटना चाहती हूँ.

यदि आप डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं तो आप शायद अन्य देखभाल करने वाले परिवारों के अनुभव जानना चाहते होंगे. आप यह जानना चाहते होंगे कि आपके प्रियजन को किस प्रकार की समस्याएँ हो सकती है, देखभाल के क्या तरीके हैं, लोग तनाव से कैसे बचते हैं, देखभाल की योजना कैसे बनाते हैं.

यूं समझिए, डिमेंशिया देखभाल एक सालों लंबा सफर है. परिवार वालों को व्यक्ति की समस्याएं समझने में समय लगता है. स्थिति स्वीकारने में, और उचित सहायता के तरीके ढूंढ़ने में और बदलाव करने में टाइम लगता है, मेहनत करनी पड़ती है. गलतियों होती हैं, निराशा होती है, एक दूसरे पर गुस्सा आता है. धीरे धीरे हालत सुधरने लगती है और परिवार वाले सोचते हैं कि शुक्र है, अब तो सब ठीक-ठाक चलने लगा है. फिर व्यक्ति का डिमेंशिया कुछ नई समस्या पैदा कर देता है, हालत और बिगड़ जाती है. परिवार वालों को समझने और तरीके ढूंढ़ने का सिलसिला फिर शुरू करना पड़ता है. देखभाल के इस सफर में उतार-चढ़ाव होते ही रहते हैं. और हर परिवार में स्थिति और उपाय अलग होते हैं.

अन्य परिवारों के देखभाल संबंधी अनुभव जानने से फायदा हो सकता है, पर ऐसे अनुभव जान पाना आसान नहीं है.

किसी देखभाल कर्ता से पूछें कि देखभाल करने का आपका अनुभव क्या है, तो वे वही कहेंगे जो उन्हें उस पल याद आता है, और जो वे बेझिझक बाँट सकते हैं. सालों-साल चलने वाले डिमेंशिया का निचोड़ यकायक चंद वाक्य में कोई कैसे दे! स्वाभाविक है कि कई लोग हाल में हुई घटनाओं पर या अभी हो रही समस्याओं पर बात करेंगे. एक महीने बाद यदि आप उन से फिर पूछें, तो वे शायद उस घटना का जिक्र ही न करें, या किसी नई समस्या के बारे में बात करें, जो अब उन्हें परेशान कर रही है. डिमेंशिया किस अवस्था में है, परिवार का अनुभव इस पर निर्भर है. डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति शुरूआती अवस्था में हो तो परिवार वाले कुछ कहेंगे, और अंतिम अवस्था हो तो कुछ और कहेंगे.

शर्म और झिझक अनुभव बांटने में बाधा पैदा करते हैं. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो लोग दूसरों को इसलिए नहीं बताएँगे क्योंकि उन्हें शर्म आती है, या उन्हें लगता है कि सुनने वाले उनकी निंदा करेंगे या उन्हें हीन या नालायक समझेंगे. खुल कर लोग तभी बात कर पाते हैं जब कि माहौल उन्हें सुरक्षित लगे और उन्हें भरोसा हो कि कोई उनकी बात लेकर उनकी निंदा नहीं करेगा.

सब परिवारों के अनुभव अलग होते हैं. यदि यह जानना हो कि डिमेंशिया में किस किस तरह के अनुभव हो सकते है तो कई लोगों से बात करनी होगी. सिर्फ एक या दो प्रकाशित लेखों को पढ़कर आपको सही और पूरी जानकारी नहीं मिल सकती. ये लेख कुछ परिवारों के कुछ अनुभव प्रस्तुत करते हैं. लेख आपके लिए कितना उपयोगी है यह इस पर निर्भर है कि रिपोर्टर ने किस इरादे से लेख लिखा है. और लेख में जो पेश है वह सिर्फ एक झलक है, क्योंकि रिपोर्टर ने तो सिर्फ कुछ परिवार चुने हैं, और उनकी बातों से सिर्फ वे कुछ अंश चुने हैं जो लेख में फिट हो रहे थे. वैसे भी कई लोग इंटरव्यू में खुल कर नहीं बोलते. शायद आप के लिए जिन देखभाल करने वालों के अनुभव उपयोगी हो सकते थे उनका इंटरव्यू न हुआ हो. शायद लेख में जो प्रस्तुत है वह अंश आपके मतलब का न हो, या आपको गलत जानकारी दे.

यदि आपको डिमेंशिया के अनुभवों के बारे में ठीक से जानकारी चाहिए तो आपको अनेक परिवारों की कहानियाँ जाननी होंगे. लेख, किताबें, ब्लॉग पढ़ने होंगे. अन्य देखभाल करने वालों से बात करनी होगी. अपनी कहानी बांटनी होगे, और दूसरों की कहानी सुननी होगी. समर्थक समुदाय में भाग लेना होगा. जितने ज्यादा परिवार वाले आपस में खुल कर बात करें, उतना ही अच्छा होगा. समुदाय के तौर पर हम सभी एक दूसरे की मदद कर सकते हैं, समर्थन दे सकते हैं.

मैं भी कई साल तक देखभाल कर्ता रह चुकी हूँ. अपने निजी अनुभव से मैं जानती हूँ कि डिमेंशिया और देखभाल के सफर में उचित जानकारी से देखभाल आसान और कारगर हो सकती है, और तनाव और अकेलापन भी कम हो जाता है. दूसरों के किस्से सुनने से मुझे माँ के डिमेंशिया को स्वीकारने में आसानी हुई थी, और उपयोगी सुझाव भी मिले थे. मैंने भी अपने अनुभव खुल कर ब्लॉग और वीडियो द्वारा बांटे हैं. और अपने डिमेंशिया वेबसाइट पर मैंने अनेक देखभाल करने वालों के विस्तृत इंटरव्यू प्रकाशित करे हैं. अखबारों में और अन्य ब्लॉग और साईट पर उपलब्ध देखभाल की कहानियों के लिंक भी एकत्रित करे हैं. डिमेंशिया देखभाल के क्षेत्र में यह मेरा एक योगदान है. कुछ लिंक:

Alzheimer’s and the brain अल्ज़ाइमर रोग में मस्तिष्क के बदलाव: एक चित्रण

अल्ज़ाइमर रोग(Alzheimer’s Disease) डिमेंशिया (मनोभ्रंश) का एक आम कारण है. इस रोग में मस्तिष्क में किस प्रकार हानि होती है, और समय के साथ यह कैसे बढ़ती है, उसका एक चित्रण, National Institute on Aging के सौजन्य से:

Alzheimers disease-brain shrinkage

Can we protect ourselves from dementia क्या हम डिमेंशिया से सुरक्षित रह सकते हैं?

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) की डरावनी सचाई के बारे में सुनते हैं तो हम यह जानना चाहते हैं कि क्या इससे बचा जा सकता है.

अखबारों में और टीवी प्रोग्राम में हम देखते और सुनते हैं कि कुछ तरीके हैं जिनसे हम डिमेंशिया से बचे रह सकते हैं. कुछ लेखों में स्वस्थ जीवन शैली के सुझाव होते हैं, कुछ में अन्य सुझाव होते हैं. सवाल यह है कि ये उपाय हमें सुरक्षित रखने में किस हद तक कारगर हो सकते हैं.

तो संक्षेप में कुछ उत्तर:

  • क्या हम अपने जीवन में कुछ ऐसे बदलाव कर सकते हैं या कुछ ऐसे कदम उठा सकते हैं जो डिमेंशिया का खतरा कम करेंगे?…..हाँ!!
  • और क्या इन कदमों से हम शत-प्रतिशत डिमेंशिया से बच जायेंगे?….. नहीं, .विशेषज्ञों का ऐसा कोई दावा नहीं है.

सच तो यह है कि फिलहाल डिमेंशिया की जानकारी इतनी पक्की नहीं है कि हम यह कह पाएँ कि यह कदम उठायें तो यह निश्चित है कि डिमेंशिया नहीं होगा. जो तरीके सुझाए जाते हैं, वे डिमेंशिया पैदा होने की संभावना कम कर सकते हैं, पर हम पूरी तरह से डिमेंशिया से बचे रहेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है. वर्तमान उपलब्ध सुझाव सब Risk reduction के तरीके हैं, सम्पूर्ण सुरक्षा के (zero-risk) तरीके नहीं.

एक अन्य पहलू यह है कि डिमेंशिया के लक्षण अनेक बीमारियों के कारण पैदा हो सकते हैं. अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease) इन बीमारियों में प्रमुख है, पर डिमेंशिया पैदा करने वाली बीमारियों की संख्या तकरीबन पचास से सौ हैं. ये बीमारियों क्यों होती हैं, और इनसे कैसे बचें, ये अब भी शोध के विषय हैं.

यदि हम यह चाहें कि डिमेंशिया के सभी प्रकार से सुरक्षित रहें, तो इसका मतलब है हमें हरेक डिमेंशिया रोग से सुरक्षित रहना होगा. इसके लिए जरूरी जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है.

विशेषज्ञों की सिफारिश है कि हम हम डिमेंशिया से बचाव के सुझाव अपनाएँ. गौर-तलब है कि डिमेंशिया के खतरे को कम करने के लिए जो सुझाव दिए जाते हैं वे अक्सर जीवन शैली सम्बंधित हैं. उनको अपनाने से अन्य रोगों की संभावना भी कम होगी. उदाहरण: नियमित व्यायाम का सुझाव तो डॉक्टर मधुमेह (diabetes) और उच्च रक्त-चाप (high blood pressure) से बचने के लिए भी देते हैं. बढ़ती उम्र के बावजूद हम स्वस्थ, सक्रिय और खुश रह पाएँ, इसकी संभावना बढ़ाने के लिए इन बचाव के तरीकों को अपनाना अकलमंदी है.

पर एक बात का खयाल रखें….

यदि किसी को डिमेंशिया हो, तो यह न सोचें कि व्यक्ति ने अपने स्वास्थ्य का खयाल नहीं रखा होगा. डिमेंशिया का होना किसी लापरवाही का नतीजा कतई नहीं है. सच तो यह है कि डिमेंशिया क्यों होता है, किसे होता है, कब हो सकता है, इस सब की समझ अभी बहुत कच्ची और अधूरी है. उत्तम जीवन शैली अपनाने वालों को भी डिमेंशिया हो सकता है.

एक अन्य पहलू यह है कि अच्छी जीवन शैली अपनाने के बाद भी हमें डिमेंशिया के लक्षणों के प्रति सचेत रहना होगा. यदि हम डिमेंशिया के कुछ लक्षण देखें तो डॉक्टर से सलाह करना उचित होगा. यह मत सोचिये कि भई, हम तो पूरी सावधानी से जी रहे थे, हमें कुछ नहीं हो सकता. अपनी तरफ से पूरी कोशिश के बावजूद हमें डिमेंशिया हो सकता है. स्वयं को दोष न दें, न ही अपने में हो रहे बदलाव को नकारें. डॉक्टर से यथा-उचित सलाह कर.

Different dementia diseases and symptoms अलग अलग रोग और डिमेंशिया लक्षण

डिमेंशिया के लक्षणों का मूल कारण है मस्तिष्क में हुई हानि, जिसके कारण व्यक्ति के सोचने-समझने और काम करने में समस्याएँ होने लगती हैं. मोटे तौर पर सब लक्षण संज्ञान से संबंधित हैं, पर फिर भी, किसी विशिष्ट व्यक्ति में कौनसे लक्षण पेश होंगे, वे कितने गंभीर होंगे, और समय के साथ कैसे बढ़ेंगे, यह फर्क रहता है.

मस्तिष्क के कई भाग हैं और वे अलग अलग कार्यों का नियंत्रण करते हैं. डिमेंशिया के लक्षण अनेक रोगों के कारण हो सकते हैं. यह सब रोग मस्तिष्क में हानि से संबंधित हैं, पर हर रोग में मस्तिष्क के किस भाग में कितनी हानि होती है, और समय के साथ यह कैसे बढ़ती है, यह अलग अलग है. मस्तिष्क के किस भाग में कितनी क्षति हुई है, लक्षण उसके अनुसार ही होंगे.

उदाहरणतः, अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease) में शुरू में हिप्पोकैम्पस (hippocampus) में असामान्य प्रोटीन खंड जमा होने लगते हैं. हिप्पोकाम्पस हमारे मस्तिष्क का वह भाग है जिसका सम्बन्ध हाल में हुई घटनाओं को याद रखने से है. इसलिए अल्ज़ाइमर रोग का एक शुरूआती लक्षण यह है कि व्यक्ति को कुछ ही देर पहले हुई बातों को याद रखने में दिक्कत होने लगती है (short term memory loss). जैसे जैसे रोग के कारण मस्तिष्क में हानि अन्य भागों में फैलती है, उन प्रभावित भागों से संबंधित कार्यों में भी व्यक्ति को दिक्कत होने लगती है.

Gray739-emphasizing-hippocampusअल्ज़ाइमर में सबसे पहले प्रभावित भाग है हिप्पोकैम्पस

पर एक अन्य डिमेंशिया रोग है फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया (Fronto-temporal dementia). वास्तव में यह एक रोग नहीं, बल्कि एक ऐसे रोगों का समूह है जिन सब में हानि मस्तिष्क के फ्रंटल लोब और टेम्पोरल लोब में होती है.

फ्रंटल लोब (frontal lobe, ललाटखंड, मस्तिष्क का सामने वाला भाग) का सम्बन्ध हमारे निर्णय लेने की क्षमता से है. क्या महत्त्वपूर्ण है और क्या नहीं, किस कार्य करने का क्या अंजाम होगा, हम चुनाव कैसे करें, कौन सा व्यवहार समाज में अनुचित है, यह सब हम अपने फ्रंटल लोब के कारण जाना पाते हैं और कर पाते पाते हैं. ध्यान देना और योजना बनाना, भावनाओं के नियंत्रण रखना, इन सब में फ्रंटल लोब की जरूरत है. टेम्पोरल लोब (temporal lobe, शंख खंड) का भाषा समझने और इस्तेमाल करने से, और इन्द्रिओं से आये संकेत समझने और याद रखने से है.

Cerebrum lobesफ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया में फ्रंटल लोब और टेम्पोरल लोब के कुछ अंशों में हानि होती है

जब किसी व्यक्ति को फ्रंटोटेम्पोरल किस्म का डिमेंशिया होता है, तो शुरूआती लक्षण अधिकतर भाषा-संबंधी या व्यवहार संबंधी होते हैं, याददाश्त संबंधी नहीं. यह इसलिए क्योंकि हानि मस्तिष्क के फ्रंटल लोब और टेम्पोरल लोब में हुई है, हिप्पोकैम्पस में नहीं. पर फ्रंटोटेम्पोरल किस्म का डिमेंशिया में भी, कौनसे लक्षण पेश आयेंगे यह इस बात पर निर्भर है कि फ्रंटल और टेम्पोरल लोब के किस अंश में कितनी हानि हुई है. हो सकता है एक व्यक्ति का व्यवहार अशिष्ट या अश्लील हो, पर दूसरे व्यक्ति में पहले दिखना वाला प्रमुख लक्षण हो भाषा की समस्या.

एक और उदाहरण है संवहनी मनोभ्रंश (नाड़ी-संबंधी डिमेंशिया, Vascular dementia). यह नाड़ी-संबंधी समस्याओं के कारण होने वाले डिमेंशिया के लिए एक व्यापक शब्द है. मोटे तौर पर कहें तो रक्त वाहिकाओं में समस्याओं के कारण मस्तिष्क के कुछ भागों में खून कम पहुँचता है, या बिलकुल ही नहीं पहुँचता, और नतीजन मस्तिष्क का कुछ भाग नष्ट हो जाता है. कौनसे लक्षण नज़र आयेंगे यह इसपर निर्भर है कि मस्तिष्क के किस भाग में क्षति हुई है, और क्षति कितनी गंभीर है.

Living with someone who has dementia जब परिवार में किसी बुज़ुर्ग को डिमेंशिया हो

कई परिवारों में हम अपने बड़े-बुजुर्गों के साथ मिलजुल कर रहते हैं. हम उनके अनुभव का आदर करते हैं और महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर उनकी सलाह लेते हैं. कभी कभी उन्हें हमारी मदद चाहिए होती है, और इस तरह मदद करना साथ-साथ रहने का एक स्वभाविक अंग है.

क्योंकि लोग यह नहीं जानते कि डिमेंशिया और बुढ़ापे में फर्क है, वे सोचते हैं कि डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के साथ रहना किसी सामान्य, स्वस्थ बुज़ुर्ग के साथ रहने जैसा होता है. परन्तु सच्चाई तो यह है कि डिमेंशिया के कारण व्यक्ति में जो बदलाव होते हैं, उनकी वजह से हम व्यक्ति से क्या उम्मीद रख सकते हैं, यह फर्क हो जाता है. हमें व्यक्ति से बोलचाल के तरीकों को और मदद के तरीकों को भी बदलना होता है.

उदाहरण के तौर पर यह देखिये कि हम अक्सर अपने बुजुर्गों पर कुछ महत्त्वपूर्ण निर्णय छोड़ देते हैं, क्योंकि उनको हमसे ज्यादा तजुर्बा और जानकारी है. हम उनसे अक्सर पेचीदा प्रश्न करते हैं या सलाह मांगते है. घर में हो रही छोटी-बड़ी बातों के बारे में उन्हें विस्तार से बताते हैं. हमें यह उम्मीद रहती है कि बुज़ुर्ग हमारी बातें समझेंगे और उनमें रुचि लेंगे, और वे अपने अनुभव और सोच-विचार के हिसाब से हमें उचित सलाह भी देंगे.

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति इस प्रकार का रोल नहीं निभा सकते. यह इसलिए क्योंकि डिमेंशिया में सोचने-समझने की काबिलियत कम हो जाती है, और पेचीदा बातें समझना मुश्किल हो जाता है. डिमेंशिया के कारण उनकी तर्क करने की क्षमता कम हो सकती है. विचार व्यक्त करने में भी रोगी को दिक्कत होने लगती है, और वे बात करने के बीच में बात का सिर खो सकते हैं. विस्तृत वर्णन ध्यान से सुनना और याद रखना उनके लिए मुश्किल हो जाता है, और वे केंद्रित नहीं रह पाते.

ऐसा नहीं कि डिमेंशिया के कारण व्यक्ति कुछ नहीं कर पायेंगे. पर उनके करने का स्तर सामान्य बुज़ुर्ग से कम होगा क्योंकि डिमेंशिया के कारण उन्हें कई प्रकार की दिक्कतें हो रही हैं. वे बातों का कितना आनंद ले पायेंगे यह स्थिति पर निर्भर होगा. यदि उन्हें विषय में रुचि हो, तो शायद वे ध्यान दे पाएँ, अपने विचार व्यक्त करें, और कुछ सुझाव भी दें. पर यह सलाह अजीब सी हो सकती है क्योंकि हो सकता है वे बात पूरी तरह से नहीं समझ पाए थे. पेचीदा बातों से और उलझे सवालों से वे घबरा सकते हैं. रुचि का स्तर भी पहले से कम हो सकता है. वे सुस्त हो सकते हैं, या झल्ला सकते हैं. अधिक जानकारी से उन्हें लादना उनके लिए बोझ साबित हो सकता है. मध्यम अवस्था तक पहुंचते पहुंचते डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति इस प्रकार की चर्चा में अक्सर पूरी तरह भाग नहीं ले पाते हैं.

एक अन्य पहलू है रोजमर्रा के कामों में मदद की जरूरत.

उम्र के साथ अक्सर लोगों को कुछ कामों में मदद की जरूरत पड़ने लगती है, क्योंकि शरीर कमज़ोर होने लगता है. परिवार वाले यह पहचानते हैं कि बुजुर्गों के साथ रहने पर इस तरह की मदद देनी होगी.

सामान्य बुज़ुर्ग मदद करने वाले की बात समझ पाते हैं और अक्सर सहयोग भी देते हैं, क्योंकि वे भी चाहते हैं कि काम हो पाए. उदाहरण के तौर पर, यदि उन्हें चलने में दिक्कत है, तो वे दीवार पर लगी रेलिंग का इस्तेमाल करेंगे या देखभाल करने वाले का सहारा मांगेंगे. नहाने में दिक्कत हो रही है तो मदद करने वाले को पीठ पर साबुन लगाने देंगे. कुछ कर रहे हैं और पीछे से कोई आवाज़ देकर रोके, तो रुक कर पूछेंगे कि क्या हुआ?

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति को रोजमर्रा के काम में दिक्कत आम बुजुर्गों के मुकाबले कहीं ज्यादा होती है, और फर्क किस्म की होती है. मदद करने वाले की बात समझना और मदद ले पाना भी उनके लिए ज्यादा मुश्किल हो सकता है. क्योंकि व्यक्ति की सोच-समझ और काम करने की काबिलियत पहले से कम होती है, और वे मदद करने वाले की बात पूरी तरह से नहीं समझ पाते. उदाहरण के तौर पर: व्यक्ति शायद देखभाल करने वाले के शब्दों का मतलब न जान पाएँ या गलत समझें. साबुन क्या है, उन्हें शायद न समझ आये. चलते वक्त रेलिंग पकड़ने से आराम रहेगा, वे शायद यह भूल जाएँ. पीछे से दी गयी आवाज़ पर वे शायद ध्यान न दें या ऐसे घबरा जाएँ जैसे कि उन पर आक्रमण हो रहा है.

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के साथ रहने वालों को डिमेंशिया की सच्चाई को समझना और स्वीकारना होता है और उसके अनुरूप ही व्यक्ति के साथ पेश होना होता है. व्यक्ति क्या कर सकते हैं, क्या नहीं, और उन्हें किस प्रकार की दिक्कत महसूस हो रही है, यह जानना होता है. उसके अनुरूप ही व्यक्ति से उम्मीद रखना उचित है. मदद के तरीके भी ऐसे होने चाहिये जो व्यक्ति की घटी क्षमताओं और सोचने समझने में हुई कमी के बावजूद कारगर हों. व्यक्ति अक्सर बता भी नहीं पाते कि उन्हें क्या महसूस हो रहा है, और कब और कैसी मदद चाहिए, इस कारण देखभाल करने वालों को अधिक सतर्क रहना होता है.

The brain and our ability to do things मस्तिष्क और हमारी क्षमताएं

जब कहा जाता है कि डिमेंशिया में मस्तिष्क में हानि होती है तो कई लोग सोचते हैं कि इसका असर याददाश्त पर होगा, जैसे कि घटनाओं को याद रखना. मस्तिष्क में हानि के कारण शरीर के हर अंग पर असर होगा, यह नहीं सोचते. लोग यह नहीं मान पाते कि डिमेंशिया से व्यक्ति को चलने-फिरने में, बोलने में, खाना सटकने में, सभी कामों में दिक्कत होगी.

सच तो यह है कि मस्तिष्क काम न करे तो हम जीवित नहीं रहेंगे, क्योंकि हमारा मस्तिष्क ही पूरे शरीर का संचालन करता है. इसका सम्बन्ध सिर्फ बुद्धि या याददाश्त से नहीं, हर काम, हर अनुभूति, हर व्यवहार से है.

हिंदी विकिपीडिया के पृष्ठ मस्तिष्क से एक अंश:

मस्तिष्क के द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों के कार्यों का नियंत्रण एवं नियमन होता है। अतः मस्तिष्क को शरीर का मालिक अंग कहते हैं। इसका मुख्य कार्य ज्ञान, बुद्धि, तर्क शक्ति, स्मरण, विचार निर्णय, व्यक्तित्व आदि का नियंत्रण एवं नियमन करना है। … …

मस्तिष्क… चेतना (consciousness ) और स्मृति (memory) का स्थान है। सभी ज्ञानेंद्रियों – नेत्र, कर्ण, नासा, जिह्वा तथा त्वचा – से आवेग यहीं पर आते हैं, जिनको समझना अर्थात् ज्ञान प्राप्त करना मस्तिष्क का काम है। पेशियों के संकुचन से गति करवाने के लिये आवेगों को तंत्रिका सूत्रों द्वारा भेजने तथा उन क्रियाओं का नियमन करने के मुख्य केंद्र मस्तिष्क में हैं, यद्यपि ये क्रियाएँ मेरुरज्जु में स्थित भिन्न केन्द्रों से होती रहती हैं। अनुभव से प्राप्त हुए ज्ञान को संग्रह करने, विचारने तथा विचार करके निष्कर्ष निकालने का काम भी इसी अंग का है।

जब किसी को स्ट्रोक होता है, और उसके बाद वे चल-फिर नहीं पाते और बात ठीक से नहीं कर पाते, तो हम मान पाते हैं कि स्ट्रोक के कारण जो मस्तिष्क में हानि हुए होगी, यह उसका असर है. या जब दुर्घटना में सर पर चोट लगने के बाद कोई व्यक्ति लाचार हो जाता है, तब भी हम यह मान पाते हैं कि यह लाचारी तो मस्तिष्क में क्षति का असर है.

डिमेंशिया में भी मस्तिष्क के अंदर हानि होती है. पर यह हानि रातों-रात न होकर धीरे धीरे बढ़ती है. इसका किसी स्पष्ट घटना / हादसे से कोई सम्बन्ध नहीं नज़र आता. इसलिए इस को पहचानना मुश्किल होता है. यह स्वीकारना ज्यादा मुश्किल हो जाता है कि धीरे धीरे बढ़ती हुई यह हानि भी गंभीर लक्षण पैदा कर सकती है. हम यह नहीं सोच पाते कि यह हानि शरीर के हर अंग पर असर करेगी और हर काम में दिक्कत पैदा होगी.

पर स्वस्थ मस्तिष्क और डिमेंशिया से प्रभावित मस्तिष्क के अंतर का चित्र देखें तो समझना आसान हो जाता है कि इतनी हानि है तो असर भी गंभीर होगा. यह कोई एक-दो बात भूल जायेंगे, इस तक सीमित नहीं रहेगा.

स्वस्थ मस्तिष्क और अल्ज़ाइमर के रोगी का मस्तिष्क
Alzheimers brain