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डिमेंशिया: एक गंभीर समस्या (सिर्फ “भूलने” की बीमारी नहीं)

अकसर लोग डिमेंशिया को सिर्फ एक भूलने की बीमारी के नाम से जानते हैं. वे सोचते हैं कि याददाश्त की समस्या ही डिमेंशिया का एकमात्र या प्रमुख लक्षण है. पर याददाश्त की समस्या तो डिमेंशिया के लक्षणों में से सिर्फ एक है– डिमेंशिया के अनेक गंभीर और चिंताजनक लक्षण होते हैं, जिन का डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के जीवन के हरेक पहलू पर असर होता है. व्यक्ति को अपने साधारण दैनिक कार्यों में दिक्कतें होती हैं, और ये दिक्कतें समय के साथ बढ़ती जाती हैं. सहायता की जरूरत भी बढ़ती जाती है, और देखभाल का काम मुश्किल होता जाता है.

इस हिंदी प्रेजेंटेशन में देखिये डिमेंशिया क्या है, इस में मस्तिष्क में कैसी हानि होती है, लक्षण क्या हैं, और समय के साथ क्या होता है, और यह किस किस प्रकार का हो सकता है. इस के इलाज संभव हैं या नहीं, और इस की संभावना कम करने के लिए डॉक्टर क्या सुझाव देते हैं, इस पर भी स्लाइड हैं. देखभाल करने वालों को क्या करना होता है, इस पर चर्चा देखिये. इस प्रेजेंटेशन में उदाहरण और चित्र भी हैं.

हिंदी में इसे स्लाईड शेयर (Slideshare) पर देखें — यदि प्लेयर नीचे लोड न हो रहा हो तो यहाँ क्लिक करें: डिमेंशिया क्या है?(What is Dementia)

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डिप्रेशन (अवसाद) और डिमेंशिया (Depression and Dementia)

पिछले कुछ सालों में मीडिया में डिप्रेशन पर ज्यादा खुल कर चर्चा होने लगी है, खास-तौर से दीपिका पादुकोण और करण जौहर जैसी मशहूर हस्तियों के अनुभव सुनकर. पर डिप्रेशन के एक पहलू पर अब भी चर्चा कम है — डिप्रेशन का अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से सम्बन्ध.

रिसर्च के अनुसार डिप्रेशन (अवसाद) और डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के बीच में सम्बन्ध है. यह पाया गया है कि जिन लोगों में डिप्रेशन है, उनमें (आम व्यक्तियों के मुकाबले) डिमेंशिया ज्यादा देखा जाता है. इस पोस्ट में:

डिप्रेशन के बारे में

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कई लोग किसी बुरी घटना के बाद हुई उदासी या निराशा के लिए “डिप्रेशन” शब्द का इस्तेमाल करते हैं. पर बुरी घटनाओं से उदास होना एक सामान्य प्रक्रिया है. चिकित्सीय (मेडिकल) भाषा में “डिप्रेशन (अवसाद)” एक ऐसा मानसिक विकार है जिस में उदासी, निराश, अरुचि जैसी भावनाएं कम से कम दो हफ्ते से मौजूद हैं, और जिन के कारण व्यक्ति के जीवन में बाधा होती है. इस में इलाज की जरूरत है.

डिप्रेशन (अवसाद) किसी को भी हो सकता है. डिप्रेशन में व्यक्ति उदास रहते हैं, पसंद वाली गतिविधियों में रुचि खो देते हैं, ठीक से सो नहीं पाते, ठीक से खा नहीं पाते, और थके-थके रहते हैं. उन्हें ध्यान लगाने में दिक्कत होती है. सोच नकारात्मक हो जाती है. किसी भी काम में आनंद नहीं आता. वे खुद को दोषी समझते हैं. आत्मविश्वास कम हो जाता है. रोज के साधारण काम करने का मन नहीं होता. वे सामाजिक और व्यवसाय संबंधी काम भी नहीं करना चाहते. कुछ डिप्रेशन से ग्रस्त व्यक्ति इतने निराश हो जाते हैं कि आत्महत्या करना चाहते हैं.

डिप्रेशन का प्रकरण (depressive episode, डिप्रेसिव एपिसोड) कम से कम दो हफ्ते लम्बे होता है, पर अधिक लंबा भी हो सकता है. व्यक्ति को ऐसे एपिसोड बार-बार हो सकते हैं.

डिप्रेशन के लिए इलाज उपलब्ध हैं, जैसे कि अवसाद-निरोधी दवा और अनेक प्रकार की थैरेपी और गैर-दवा वाले उपचार. और अगर डिप्रेशन किसी अन्य बीमारी के कारण हुआ है (जैसे कि थाइरोइड हॉर्मोन की कमी), तो उस बीमारी को ठीक करने से डिप्रेशन दूर हो सकता है. उचित उपचार और जीवन शैली में बदलाव से अधिकाँश लोगों को डिप्रेशन से आराम मिल पाता है और वे सामान्य जीवन बिता पाते हैं.

(डिप्रेशन पर हिंदी में कुछ और जानकारी के लिए नीचे “अधिक जानकारी के लिए रेफेरेंस और उपयोगी संसाधन” में लिंक हैं)

डिमेंशिया के बारे में

डिमेंशिया एक ऐसा लक्षणों का समूह है जिस में व्यक्ति की याददाश्त में, सोचने-समझने और तर्क करने की क्षमता में, व्यक्तित्व, मनोभाव (मूड) और व्यवहार में, बोलने में, और अनेक अन्य मस्तिष्क से संबंधी कामों में दिक्कत होती है. इन लक्षणों के कारण व्यक्ति को दैनिक कार्यों में दिक्कत होती है, और यह दिक्कत समय के साथ बढ़ती जाती है. व्यक्ति अकेले अपने काम नहीं कर पाते. दूसरों पर निर्भरता बढ़ती जाती है.

डिमेंशिया किसी को भी हो सकता है, पर बड़ी उम्र के लोगों में ज्यादा पाया जाता है. ध्यान रखें, डिमेंशिया उम्र बढ़ने की सामान्य प्रक्रिया नहीं है. यह मस्तिष्क में हुई हानि के कारण होता है—जैसे कि मस्तिष्क के सेल का नष्ट होना, सेल के बीच के कनेक्शन में नुकसान, और मस्तिष्क का सिकुड़ना. ऐसे कई रोग हैं जिन में मस्तिष्क में इस तरह की हानि हो सकती है. चार रोग मुख्य हैं: अल्ज़ाइमर रोग, संवहनी डिमेंशिया, लुइ बॉडी डिमेंशिया, और फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया. अब तक ऐसी कोई दवा उपलब्ध नहीं है जिस से मस्तिष्क की हानि ठीक हो सके. डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति फिर से सामान्य नहीं हो सकते. डिमेंशिया के अंतिम चरण तक पहुँचते-पहुँचते व्यक्ति पूरी तरह निष्क्रिय और निर्भर हो जाते हैं.

(डिमेंशिया पर हिंदी में विस्तृत जानकारी के लिए नीचे “अधिक जानकारी के लिए रेफेरेंस और उपयोगी संसाधन” में लिंक हैं)

डिप्रेशन और डिमेंशिया के बीच का सम्बन्ध

रिसर्च से यह तो पता चल पाया है कि डिमेंशिया और डिप्रेशन में सम्बन्ध है, पर यह सम्बन्ध क्या है, इस पर अभी पूरी जानकारी नहीं मिल पाई है. शोध जारी है. अब तक के रिसर्च के आधार पर विशेषज्ञ मानते हैं कि डिमेंशिया और डिप्रेशन के बीच कई तरह के सम्बन्ध हैं.

डिप्रेशन डिमेंशिया का एक कारक माना जाता है.  डिप्रेशन वाले व्यक्ति में डिमेंशिया होने से संभावना ज्यादा है. कुछ विशेषज्ञों की राय है कि यह इस लिए है क्योंकि डिप्रेशन में मस्तिष्क में कई बदलाव होते हैं, और संवहनी समस्याएँ (नाड़ी संबंधी समस्याएँ) भी हो सकती हैं, और इन बदलाव के कारण डिमेंशिया की संभावना ज्यादा होती है. सब डिप्रेशन वाले लोगों को डिमेंशिया नहीं होगा, पर उन में डिमेंशिया की संभावना दूसरों के मुकाबले ज्यादा है.

डिप्रेशन को डिमेंशिया के एक लक्षण के रूप में पहचाना गया है. यह सबसे पहले प्रकट होने वाले लक्षणों में भी शामिल हो सकता है.  विशेषज्ञों के अनुसार डिमेंशिया में हुए मस्तिष्क में बदलाव के कारण जो लक्षण होते हैं, उनमें से डिप्रेशन भी एक संभव लक्षण है.  यानी कि, डिमेंशिया का एक संभव नतीजा है डिप्रेशन, और हम डिमेंशिया को डिप्रेशन का कारक समझ सकते हैं

अन्य प्रकार के सम्बन्ध: डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति को कई दिक्कतें होती हैं और व्यक्ति सामान्य जीवन नहीं बिता पाते. व्यक्ति अपनी कम हो रही कार्यक्षमता से बहुत मायूस हो सकते हैं, और नतीजन उन्हें डिप्रेशन हो सकता है. डिप्रेशन और डिमेंशिया के बीच अन्य प्रकार के सम्बन्ध भी संभव हैं, जिन में किसी दूसरी ही वजह से डिप्रेशन और डिमेंशिया साथ साथ नजर आ रहे हैं (सह-विद्यमान हैं, co-existing).

कोशिश करें कि डिप्रेशन के प्रति सतर्क रहें, खासकर बड़ी उम्र के लोगों में

डिप्रेशन का व्यक्ति पर बहुत गंभीर असर पड़ता है, इस लिए इस के प्रति सतर्क रहना और सही निदान और उपचार पाना जरूरी है. पर समाज में जागरूकता कम होने के कारण  लोग अक्सर इसे पहचान नहीं पाते और डॉक्टर की सलाह नहीं लेते.

वृद्ध लोगों में सही निदान की समस्या अधिक है, क्योंकि डिप्रेशन के लक्षण देखने पर परिवार वाले सोचते हैं कि व्यक्ति रिटायर हो चुके  हैं या बूढ़े हैं इस लिए गुमसुम रहते हैं और गतिविधियों में भाग नहीं लेते.

डिप्रेशन के प्रति सतर्क रहने के और जल्द-से-जल्द डॉक्टर से संपर्क करने के कई फायदे हैं:

  • यदि व्यक्ति को डिप्रेशन है, तो उपचार से फायदा हो सकता है. डिप्रेशन का इलाज संभव है, तो व्यक्ति व्यर्थ में तकलीफ क्यों सहे!
  • डिप्रेशन को पहचानने से और उचित इलाज से डिमेंशिया की संभावना कम करी जा सकती है. बड़ी उम्र के लोगों में डिप्रेशन और डिमेंशिया का सम्बन्ध खास तौर से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि डिमेंशिया का खतरा वृद्धों में ज्यादा होता है. यदि पता हो कि व्यक्ति को  डिप्रेशन है तो डॉक्टर और परिवार वाले व्यक्ति में डिमेंशिया के लक्षण के लिए ज्यादा सतर्क रह सकते हैं
  • यदि व्यक्ति को डिप्रेशन और डिमेंशिया दोनों हैं, तो डॉक्टर डिप्रेशन के उपचार के अलावा डिमेंशिया का रोग-निदान भी कर पायेंगे, और डिमेंशिया के बारे में जानकारी और सलाह भी दे पायेंगे. परिवार वाले भी व्यक्ति की स्थिति ज्यादा अच्छी तरह समझ सकते हैं और देखभाल के लिए सही इंतजाम कर सकते हैं
  • डिप्रेशन का सम्बन्ध अन्य भी कुछ बीमारियों से है, जैसे कि हृदय रोग. इस लिए डिप्रेशन के रोग-निदान और इलाज से दूसरे स्वास्थ्य-संबंधी फायदे भी हैं.

अधिक जानकारी के लिए रेफेरेंस और उपयोगी संसाधन

डिमेंशिया से सम्बंधित अन्य रोगों पर हिंदी में विस्तृत पृष्ट देखें:

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भारत में डिमेंशिया, 2015: परिवारों की मदद कैसे करें (एक चित्रण)

पिछले कुछ ब्लॉग पोस्ट से स्पष्ट है कि जिन परिवारों में किसी को डिमेंशिया है, उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. परन्तु भारत में डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के बारे में जागरूकता कम है, और जरूरी सहायता और सेवाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं. समय पर रोग निदान नहीं हो पाता, और कई साल लंबे इस डिमेंशिया के सफर में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.

डिमेंशिया से ग्रस्त लोगों और उनकी देखभाल कर रहे परिवार वालों की मदद कैसे करें?

भारत में डिमेंशिया संबंधी नीति और कार्यक्रमों की जरूरत है. उपयुक्त देखभाल प्रणाली बननी चाहिए, जो परिवार वाले अपना सकें. दवाओं के लिए शोध होना चाहिए. निधान और सपोर्ट करने वाले विशेषज्ञों की संख्या कम है; शिक्षा और प्रशिक्षण द्वारा यह क्षमता बढ़ानी होगी. समाज में डिमेंशिया जागरूकता और जानकारी बढ़नी चाहिए. सेवाओं को उपलब्ध कराना होगा. परिवारों को सलाह और सहायता मिलनी चाहिए. इन सब क्षेत्रों में सरकार, विशेषज्ञ, स्वयंसेवक, निजी कंपनी, गैर सरकारी संगठन वाले, इत्यादि, योगदान कर सकते हैं और परिवार वालों का काम कम कर सकते हैं.

आम आदमी भी छोटे और बड़े कामों से परिवार वालों की स्थिति में सुधार ला सकते हैं. हम सब योगदान कर सकते हैं. आस पास के लोगों में लक्षणों के प्रति सतर्क रह सकते हैं, जागरूकता फैला सकते हैं. समाज को डिमेंशिया-फ्रेंडली (dementia-friendly community)बनाने में योगदान कर सकते हैं. डिमेंशिया वाले परिवारों के प्रति संवेदनशील रह सकते हैं, और अपनी हिम्मत के अनुसार उनके छोटे-बड़े काम बाँट सकते हैं. हम उनके तनाव और डिप्रेशन में उनके साथ रह सकते हैं, और उन्हें भावनात्मक सपोर्ट दे सकते हैं. हम किसी डिमेंशिया-संबंधी संस्था से संपर्क करके अपना समय, कौशल और पैसे भी दे सकते हैं. हम शोध और सर्वे में भी भाग ले सकते हैं.

हम सब डिमेंशिया वाले परिवारों की मदद कैसे कर सकते हैं, इस पर कुछ सुझावों का चित्रण नीचे देखें. यह चित्र एक चार-भाग वाले इन्फोग्राफिक का चौथा भाग है.

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ब्लॉग पोस्ट से संबंधित कुछ लिंक

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भारत में डिमेंशिया, 2015: देखभाल की चुनौतियाँ (एक चित्रण)

भारत में डिमेंशिया (मनोभ्रंश) से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल का काम अधिकाँश केस में उस व्यक्ति के परिवार वाले संभालते हैं.

डिमेंशिया का सफर कई साल चलता है. इस दौरान व्यक्ति की क्षमताएं घटती जाती हैं, और निर्भरता बढ़ती जाती है. शुरू में तो ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं होती, पर व्यक्ति का हाल बिगड़ता रहता है और समय के साथ साथ अधिक सतर्कता और मदद की जरूरत होने लगती है.

देखभाल करने में अनेक प्रकार की दिक्कतें होती हैं. देखभाल के लिए अधिक पैसे और समय की जरूरत होने लगती है. पर देखभाल कैसे करें, इसके लिए क्या प्लान करें, आगे क्या क्या हो सकता है, इस सब को समझने के लिए जरूरी जानकारी नहीं मिल पाती. सेवाएँ और सहायता भी नहीं उपलब्ध हैं. देखभाल करने वाले अकेले पड़ जाते हैं, थक जाते हैं, आर्थिक समस्याओं का सामना करते हैं, और समाज की निंदा भी सहते हैं. अनेक देखभाल करने वाले डिप्रेशन और तनाव से ग्रस्त होते हैं.

भारत में डिमेंशिया देखभाल की सच्चाइयों का एक चित्रण नीचे पेश है. इसमें भारत में देखभाल की स्थिति और चुनौतियों को दिखाया गया है. यह चित्र एक चार-भाग वाले इन्फोग्राफिक का दूसरा भाग है.

नीचे देखें: भारत में डिमेंशिया देखभाल की चुनौतियाँ:

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भारत में डिमेंशिया, 2015: वर्तमान स्थिति (एक चित्रण)

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के बारे में जागरूकता कम है, इसलिए अक्सर लोग सोचते हैं कि शायद भारत में लोगों को डिमेंशिया नहीं होता, या होता भी है तो अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम होता है. सच तो यह है कि पर भारत में भी कई लोगों को डिमेंशिया है, पर डिमेंशिया की सही पहचान नहीं हो पाती, और डिमेंशिया वाले व्यक्ति को न तो सही उपचार मिल पाता है, न ही परिवार वाले देखभाल के उपयुक्त तरीके इस्तेमाल कर पाते हैं.

डिमेंशिया पर कई प्रकाशित रिपोर्ट हैं, पर आम लोगों को ऐसी रिपोर्ट पढ़ने और समझने के लिए टाइम नहीं होता. इसलिए मैंने भारत में डिमेंशिया और देखभाल की वर्तमान स्थिति और भविष्य के अनुमान का अंग्रेज़ी और हिंदी में चित्रण तैयार करा है. यह चित्रण (इन्फोग्राफिक) चार भागों में है: वर्तमान स्थिति, देखभाल की चुनौतियाँ, भविष्य के लिए अनुमान, और परिवार वालों की मदद कैसे करें.

नीचे देखें इस इन्फोग्राफिक का पहला भाग: भारत में डिमेंशिया की वर्तमान स्थिति:

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Hindi video: My mother’s dementia journey माँ का डिमेंशिया का सफर (वीडियो)

मेरी माँ को डिमेंशिया था. उनके डिमेंशिया के लंबे सफर में मैं उनके साथ थी, और उस दौरान के अनुभव मैंने अपने अंग्रेज़ी ब्लॉग में अनेक ब्लॉग पोस्ट में बांटे हैं. हाल ही में मैंने माँ के डिमेंशिया के सफर और उनकी देखभाल पर दो हिंदी वीडियो भी बनाए हैं, और ये यूट्यूब पर उपलब्ध हैं.

माँ के डिमेंशिया के अनुभव पर मेरा वीडियो नीचे देखें:

(प्लेयर ठीक से न चले तो आप वीडियो सीधे यूट्यूब पर देख सकते हैं, यहाँ क्लिक करें: My mother’s dementia journey (माँ का डिमेंशिया का सफर)this youtube link directly)

मेरे अंग्रेज़ी ब्लॉग पर इस विषय पर पोस्ट देखना चाहें तो लिंक नीचे हैं:

अंग्रेज़ी ब्लॉग: click here for my English blog

माँ के डिमेंशिया के, और डिमेंशिया संबंधित देखभाल के मेरे अनुभव के अंग्रेज़ी ब्लॉग पोस्ट अनेक श्रेणियों में हैं. इनके लिंक: Dementia Diagnosis, Living with dementia, Challenging Behavior, People around us, Adapting home and life, और Late stage care.

Can we protect ourselves from dementia क्या हम डिमेंशिया से सुरक्षित रह सकते हैं?

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) की डरावनी सचाई के बारे में सुनते हैं तो हम यह जानना चाहते हैं कि क्या इससे बचा जा सकता है.

अखबारों में और टीवी प्रोग्राम में हम देखते और सुनते हैं कि कुछ तरीके हैं जिनसे हम डिमेंशिया से बचे रह सकते हैं. कुछ लेखों में स्वस्थ जीवन शैली के सुझाव होते हैं, कुछ में अन्य सुझाव होते हैं. सवाल यह है कि ये उपाय हमें सुरक्षित रखने में किस हद तक कारगर हो सकते हैं.

तो संक्षेप में कुछ उत्तर:

  • क्या हम अपने जीवन में कुछ ऐसे बदलाव कर सकते हैं या कुछ ऐसे कदम उठा सकते हैं जो डिमेंशिया का खतरा कम करेंगे?…..हाँ!!
  • और क्या इन कदमों से हम शत-प्रतिशत डिमेंशिया से बच जायेंगे?….. नहीं, .विशेषज्ञों का ऐसा कोई दावा नहीं है.

सच तो यह है कि फिलहाल डिमेंशिया की जानकारी इतनी पक्की नहीं है कि हम यह कह पाएँ कि यह कदम उठायें तो यह निश्चित है कि डिमेंशिया नहीं होगा. जो तरीके सुझाए जाते हैं, वे डिमेंशिया पैदा होने की संभावना कम कर सकते हैं, पर हम पूरी तरह से डिमेंशिया से बचे रहेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है. वर्तमान उपलब्ध सुझाव सब Risk reduction के तरीके हैं, सम्पूर्ण सुरक्षा के (zero-risk) तरीके नहीं.

एक अन्य पहलू यह है कि डिमेंशिया के लक्षण अनेक बीमारियों के कारण पैदा हो सकते हैं. अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease) इन बीमारियों में प्रमुख है, पर डिमेंशिया पैदा करने वाली बीमारियों की संख्या तकरीबन पचास से सौ हैं. ये बीमारियों क्यों होती हैं, और इनसे कैसे बचें, ये अब भी शोध के विषय हैं.

यदि हम यह चाहें कि डिमेंशिया के सभी प्रकार से सुरक्षित रहें, तो इसका मतलब है हमें हरेक डिमेंशिया रोग से सुरक्षित रहना होगा. इसके लिए जरूरी जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है.

विशेषज्ञों की सिफारिश है कि हम हम डिमेंशिया से बचाव के सुझाव अपनाएँ. गौर-तलब है कि डिमेंशिया के खतरे को कम करने के लिए जो सुझाव दिए जाते हैं वे अक्सर जीवन शैली सम्बंधित हैं. उनको अपनाने से अन्य रोगों की संभावना भी कम होगी. उदाहरण: नियमित व्यायाम का सुझाव तो डॉक्टर मधुमेह (diabetes) और उच्च रक्त-चाप (high blood pressure) से बचने के लिए भी देते हैं. बढ़ती उम्र के बावजूद हम स्वस्थ, सक्रिय और खुश रह पाएँ, इसकी संभावना बढ़ाने के लिए इन बचाव के तरीकों को अपनाना अकलमंदी है.

पर एक बात का खयाल रखें….

यदि किसी को डिमेंशिया हो, तो यह न सोचें कि व्यक्ति ने अपने स्वास्थ्य का खयाल नहीं रखा होगा. डिमेंशिया का होना किसी लापरवाही का नतीजा कतई नहीं है. सच तो यह है कि डिमेंशिया क्यों होता है, किसे होता है, कब हो सकता है, इस सब की समझ अभी बहुत कच्ची और अधूरी है. उत्तम जीवन शैली अपनाने वालों को भी डिमेंशिया हो सकता है.

एक अन्य पहलू यह है कि अच्छी जीवन शैली अपनाने के बाद भी हमें डिमेंशिया के लक्षणों के प्रति सचेत रहना होगा. यदि हम डिमेंशिया के कुछ लक्षण देखें तो डॉक्टर से सलाह करना उचित होगा. यह मत सोचिये कि भई, हम तो पूरी सावधानी से जी रहे थे, हमें कुछ नहीं हो सकता. अपनी तरफ से पूरी कोशिश के बावजूद हमें डिमेंशिया हो सकता है. स्वयं को दोष न दें, न ही अपने में हो रहे बदलाव को नकारें. डॉक्टर से यथा-उचित सलाह कर.

Living with someone who has dementia जब परिवार में किसी बुज़ुर्ग को डिमेंशिया हो

कई परिवारों में हम अपने बड़े-बुजुर्गों के साथ मिलजुल कर रहते हैं. हम उनके अनुभव का आदर करते हैं और महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर उनकी सलाह लेते हैं. कभी कभी उन्हें हमारी मदद चाहिए होती है, और इस तरह मदद करना साथ-साथ रहने का एक स्वभाविक अंग है.

क्योंकि लोग यह नहीं जानते कि डिमेंशिया और बुढ़ापे में फर्क है, वे सोचते हैं कि डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के साथ रहना किसी सामान्य, स्वस्थ बुज़ुर्ग के साथ रहने जैसा होता है. परन्तु सच्चाई तो यह है कि डिमेंशिया के कारण व्यक्ति में जो बदलाव होते हैं, उनकी वजह से हम व्यक्ति से क्या उम्मीद रख सकते हैं, यह फर्क हो जाता है. हमें व्यक्ति से बोलचाल के तरीकों को और मदद के तरीकों को भी बदलना होता है.

उदाहरण के तौर पर यह देखिये कि हम अक्सर अपने बुजुर्गों पर कुछ महत्त्वपूर्ण निर्णय छोड़ देते हैं, क्योंकि उनको हमसे ज्यादा तजुर्बा और जानकारी है. हम उनसे अक्सर पेचीदा प्रश्न करते हैं या सलाह मांगते है. घर में हो रही छोटी-बड़ी बातों के बारे में उन्हें विस्तार से बताते हैं. हमें यह उम्मीद रहती है कि बुज़ुर्ग हमारी बातें समझेंगे और उनमें रुचि लेंगे, और वे अपने अनुभव और सोच-विचार के हिसाब से हमें उचित सलाह भी देंगे.

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति इस प्रकार का रोल नहीं निभा सकते. यह इसलिए क्योंकि डिमेंशिया में सोचने-समझने की काबिलियत कम हो जाती है, और पेचीदा बातें समझना मुश्किल हो जाता है. डिमेंशिया के कारण उनकी तर्क करने की क्षमता कम हो सकती है. विचार व्यक्त करने में भी रोगी को दिक्कत होने लगती है, और वे बात करने के बीच में बात का सिर खो सकते हैं. विस्तृत वर्णन ध्यान से सुनना और याद रखना उनके लिए मुश्किल हो जाता है, और वे केंद्रित नहीं रह पाते.

ऐसा नहीं कि डिमेंशिया के कारण व्यक्ति कुछ नहीं कर पायेंगे. पर उनके करने का स्तर सामान्य बुज़ुर्ग से कम होगा क्योंकि डिमेंशिया के कारण उन्हें कई प्रकार की दिक्कतें हो रही हैं. वे बातों का कितना आनंद ले पायेंगे यह स्थिति पर निर्भर होगा. यदि उन्हें विषय में रुचि हो, तो शायद वे ध्यान दे पाएँ, अपने विचार व्यक्त करें, और कुछ सुझाव भी दें. पर यह सलाह अजीब सी हो सकती है क्योंकि हो सकता है वे बात पूरी तरह से नहीं समझ पाए थे. पेचीदा बातों से और उलझे सवालों से वे घबरा सकते हैं. रुचि का स्तर भी पहले से कम हो सकता है. वे सुस्त हो सकते हैं, या झल्ला सकते हैं. अधिक जानकारी से उन्हें लादना उनके लिए बोझ साबित हो सकता है. मध्यम अवस्था तक पहुंचते पहुंचते डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति इस प्रकार की चर्चा में अक्सर पूरी तरह भाग नहीं ले पाते हैं.

एक अन्य पहलू है रोजमर्रा के कामों में मदद की जरूरत.

उम्र के साथ अक्सर लोगों को कुछ कामों में मदद की जरूरत पड़ने लगती है, क्योंकि शरीर कमज़ोर होने लगता है. परिवार वाले यह पहचानते हैं कि बुजुर्गों के साथ रहने पर इस तरह की मदद देनी होगी.

सामान्य बुज़ुर्ग मदद करने वाले की बात समझ पाते हैं और अक्सर सहयोग भी देते हैं, क्योंकि वे भी चाहते हैं कि काम हो पाए. उदाहरण के तौर पर, यदि उन्हें चलने में दिक्कत है, तो वे दीवार पर लगी रेलिंग का इस्तेमाल करेंगे या देखभाल करने वाले का सहारा मांगेंगे. नहाने में दिक्कत हो रही है तो मदद करने वाले को पीठ पर साबुन लगाने देंगे. कुछ कर रहे हैं और पीछे से कोई आवाज़ देकर रोके, तो रुक कर पूछेंगे कि क्या हुआ?

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति को रोजमर्रा के काम में दिक्कत आम बुजुर्गों के मुकाबले कहीं ज्यादा होती है, और फर्क किस्म की होती है. मदद करने वाले की बात समझना और मदद ले पाना भी उनके लिए ज्यादा मुश्किल हो सकता है. क्योंकि व्यक्ति की सोच-समझ और काम करने की काबिलियत पहले से कम होती है, और वे मदद करने वाले की बात पूरी तरह से नहीं समझ पाते. उदाहरण के तौर पर: व्यक्ति शायद देखभाल करने वाले के शब्दों का मतलब न जान पाएँ या गलत समझें. साबुन क्या है, उन्हें शायद न समझ आये. चलते वक्त रेलिंग पकड़ने से आराम रहेगा, वे शायद यह भूल जाएँ. पीछे से दी गयी आवाज़ पर वे शायद ध्यान न दें या ऐसे घबरा जाएँ जैसे कि उन पर आक्रमण हो रहा है.

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के साथ रहने वालों को डिमेंशिया की सच्चाई को समझना और स्वीकारना होता है और उसके अनुरूप ही व्यक्ति के साथ पेश होना होता है. व्यक्ति क्या कर सकते हैं, क्या नहीं, और उन्हें किस प्रकार की दिक्कत महसूस हो रही है, यह जानना होता है. उसके अनुरूप ही व्यक्ति से उम्मीद रखना उचित है. मदद के तरीके भी ऐसे होने चाहिये जो व्यक्ति की घटी क्षमताओं और सोचने समझने में हुई कमी के बावजूद कारगर हों. व्यक्ति अक्सर बता भी नहीं पाते कि उन्हें क्या महसूस हो रहा है, और कब और कैसी मदद चाहिए, इस कारण देखभाल करने वालों को अधिक सतर्क रहना होता है.

The brain and dementia: some pictures डिमेंशिया में मस्तिष्क में हानि होती है: कुछ चित्र

आइये कुछ चित्रों द्वारा समझें कि सामान्य व्यक्ति के मस्तिष्क में और डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के मस्तिष्क में किस प्रकार का फर्क होता है. नीचे दिए गए चित्रों में सामान्य व्यक्ति के मस्तिष्क का चित्रण और अल्ज़ाइमर के रोगी के मस्तिष्क का चित्रण है (अल्जाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे आम कारण है) और समय के साथ हानि कैसे बढ़ती है, इसके भी चित्र हैं.

इन चित्रों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मस्तिष्क की इतनी हानि है तो व्यक्ति पर अच्छा खासा असर तो होगा ही, और गंभीर लक्षण नज़र आना स्वाभाविक है. (अन्य डिमेंशिया के प्रकारों में भी मस्तिष्क में गंभीर हानि होती है)


स्वस्थ मस्तिष्क और अल्ज़ाइमर के रोगी का मस्तिष्क

चित्र का सौजन्य: National Institute on Aging/National Institutes of Health


समय के साथ मस्तिष्क में हानि कैसे बढ़ती है: अल्ज़ाइमर के रोगी का मस्तिष्क

चित्र का सौजन्य: National Institute on Aging/National Institutes of Health


जब कभी व्यक्ति कुछ अजीब व्यवहार दिखाएँ, या किसी ऐसी बात से कन्फ्यूज़ हो जाएँ जो आपको सरल और साधारण लगे, तो इन चित्रों को याद करें. यह स्वीकार करना आसान हो जाएगा कि मस्तिष्क में इस प्रकार की हानि है तो व्यक्ति को वास्तव में कठिनाई हो रही होगी.

Dementia and wandering डिमेंशिया और भटकने की समस्या

एक पिछली पोस्ट में डिमेंशिया और भटकने की समस्या का जिक्र करा था. अक्सर परिवार वालों को लक्षणों की गंभीरता का एहसास तब होता है जब व्यक्ति भटक जाते हैं और घर कहाँ है, यह उन्हें याद नहीं होता. वे पूछने वालों को अपना नाम और पता भी ठीक से नहीं पता पाते. किस्मत अच्छी हो तो कोई उन्हें पहचान लेता है और घर ले आता है, पर कभी कभी व्यक्ति कई घंटे या दिन लापता रहते हैं. कभी कभी वे बहुत ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलते, वे कभी वापस नहीं आते..

भटकना डिमेंशिया में एक आम समस्या है. माँ की देखभाल करते हुए मेरे भी ऐसे कई अनुभव थे जिनमें मैं कोशिश करती रही कि माँ के भटकने को कैसे रोकूं. भटकना रोकने के लिए कई सुझाव जोड़ कर कुछ साल पहले मैंने इस विषय पर एक वीडियो भी बनाया.

(यदि वीडियो प्लेयर नीचे लोड नहीं होता, तो आप इसे यूट्यूब पर यहाँ देख सकते हैं.