हम डिमेंशिया/ अल्ज़ाइमर से कैसे बच सकते हैं?

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के शुरू के लक्षण मंद होते हैं, पर आगे जाकर व्यक्ति में कई गंभीर और चिंताजनक लक्षण नजर आते हैं, जिन का डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के जीवन के हरेक पहलू पर असर होता है. अंतिम चरण में तो व्यक्ति अकसर बिस्तर पर ही होते हैं और हर काम के लिए निर्भर होते हैं.

डिमेंशिया/ अल्ज़ाइमर की गंभीरता पहचानने वाले अकसर पूछते हैं कि यह किसे होता है, क्यों होता है, और हम इससे कैसे बच सकते हैं. डिमेंशिया के लक्षण अनेक रोगों से पैदा हो सकते हैं (अल्ज़ाइमर इन में मुख्य है). अब तक वैज्ञानिकों को डिमेंशिया का कोई पक्का कारण नहीं पता, और न ही उन्हें इस से बचने का कोई पक्का तरीका मालूम है, पर हम डिमेंशिया के जोखिम कारकों को जानते हैं. और हम अपनी जीवन शैली में कुछ बदलाव करके अपनी डिमेंशिया की संभावना को कम कर सकते हैं.

इस हिंदी प्रेजेंटेशन में देखिये डिमेंशिया किसे हो सकता है, इस के जोखिम कारक क्या हैं, और आप इस की संभावना कम करने के लिए क्या कर सकते हैं. यह प्रस्तुति अब तक के शोध पर आधारित है और इस में अनेक ऐसे कारगर उपाय हैं, जिन से डिमेंशिया की संभावना के साथ-साथ अन्य कई स्वास्थ्य समस्याओं की संभावना भी कम होगी. इस प्रेजेंटेशन में उदाहरण और चित्र भी हैं.

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डिमेंशिया: एक गंभीर समस्या (सिर्फ “भूलने” की बीमारी नहीं)

अकसर लोग डिमेंशिया को सिर्फ एक भूलने की बीमारी के नाम से जानते हैं. वे सोचते हैं कि याददाश्त की समस्या ही डिमेंशिया का एकमात्र या प्रमुख लक्षण है. पर याददाश्त की समस्या तो डिमेंशिया के लक्षणों में से सिर्फ एक है– डिमेंशिया के अनेक गंभीर और चिंताजनक लक्षण होते हैं, जिन का डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के जीवन के हरेक पहलू पर असर होता है. व्यक्ति को अपने साधारण दैनिक कार्यों में दिक्कतें होती हैं, और ये दिक्कतें समय के साथ बढ़ती जाती हैं. सहायता की जरूरत भी बढ़ती जाती है, और देखभाल का काम मुश्किल होता जाता है.

इस हिंदी प्रेजेंटेशन में देखिये डिमेंशिया क्या है, इस में मस्तिष्क में कैसी हानि होती है, लक्षण क्या हैं, और समय के साथ क्या होता है, और यह किस किस प्रकार का हो सकता है. इस के इलाज संभव हैं या नहीं, और इस की संभावना कम करने के लिए डॉक्टर क्या सुझाव देते हैं, इस पर भी स्लाइड हैं. देखभाल करने वालों को क्या करना होता है, इस पर चर्चा देखिये. इस प्रेजेंटेशन में उदाहरण और चित्र भी हैं.

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पार्किंसन रोग और डिमेंशिया (Parkinson’s Disease and Dementia)

हम में से कई लोगों ने पार्किंसन रोग (Parkinson’s Disease) से ग्रस्त लोगों को देखा है, और हम जानते हैं कि पार्किंसन एक गंभीर समस्या है. दवा से इस में पूरा आराम नहीं मिल पाता, और व्यक्ति की स्थिति समय के साथ खराब होती जाती है. पर आम तौर पर हम पार्किंसन रोग के सिर्फ कुछ मुख्य शारीरिक लक्षण जानते हैं —  हम यह नहीं जानते हैं कि इस में अनेक दूसरे प्रकार के लक्षण भी होते हैं. ये भी समय के साथ साथ बिगड़ते जाते हैं, और अनेक तरह से व्यक्ति के जीवन में बाधा डालते हैं. व्यक्ति सामान्य जीवन नहीं बिता पाते. एक चिंताजनक पहलू है पार्किंसन और डिमेंशिया (मनोभ्रंश, dementia) के बीच का सम्बन्ध: पार्किंसन वाले व्यक्तियों में से कई व्यक्तियों को डिमेंशिया भी हो जाता है.

parkinson man

पार्किंसन रोग मस्तिष्क के कुछ भागों में विकार के कारण होता है. इसकी खास पहचान वाले लक्षण हैं: कंपन (ट्रेमर), जकड़न, काम करने में धीमापन, गति में बदलाव, शारीरिक संतुलन (बैलैंस) में दिक्कत. इस रोग को अकसर मोटर डिसॉर्डर या मूवमेंट डिसॉर्डर भी कहा जाता है (हरकत में विकार).

पार्किंसन के ऐसे भी कई लक्षण हैं जिन का चलने फिरने या हरकत से सम्बन्ध नहीं है. उदाहरण- मूड के विकार, ध्यान लगाने में समस्या, योजना न बना पाना, याददाश्त की समस्या, दृष्टि भ्रम, पेशाब करने में दिक्कत, सूंघने की काबिलियत खो देना, नींद में समस्या, वगैरह.

पार्किंसन रोग एक प्रगतिशील विकार हैं. इस के अधिकाँश केस बड़ी उम्र के लोगों में होते हैं, पर यह कम उम्र में भी हो सकता है. इसके लक्षण समय के साथ बिगड़ते जाते हैं. चलने फिरने और शरीर पर नियंत्रण रख पाने की समस्याएँ बहुत गंभीर हो जाती हैं. इस के अलावा अन्य लक्षण भी ज्यादा बढ़ जाते हैं जैसे कि शरीर में दर्द, थकान, और रक्तचाप कम होना. निगलने में दिक्कत होने लगती है, और सही मात्रा में जल और पौष्टिक खाना देना मुश्किल हो जाता है. अग्रिम अवस्था में पार्किंसन से ग्रस्त व्यक्ति डिमेंशिया और डिप्रेशन के शिकार भी हो सकते हैं.

पार्किंसन और डिमेंशिया के बीच का सम्बन्ध चिंताजनक है, क्योंकि दोनों ही बहुत गंभीर रोग हैं. कुछ अनुमान के अनुसार करीब एक-तिहाई पार्किंसन रोगियों को डिमेंशिया होगा. इसे पार्किन्संस रोग डिमेंशिया (Parkinson’s Disease Dementia) कहते हैं.

पार्किंसन रोग और डिमेंशिया के बीच एक दूसरा सम्बन्ध भी है. कुछ प्रकार के डिमेंशिया में व्यक्ति में पर्किन्सोनिस्म (पार्किन्सन किस्म के लक्षण) भी हो सकता है. “डिमेंशिया विथ लुइ बॉडीज” (Dementia with Lewy Bodies) नामक डिमेंशिया में यह लक्षण आम हैं: अनुमान है की इस प्रकार के डिमेंशिया में करीब दो-तिहाई लोगों में हरकत की समस्याएँ होंगी.

lewy body in neuron

अब तक के शोध से यह पता चला है कि पार्किंसन रोग में और लुइ बॉडी डिमेंशिया में मस्तिष्क में हुए बदलाव में समानता है—दोनों में मस्तिष्क की कोशिकाओं (मस्तिष्क के सेल) में एक असामान्य संरचना, “लुइ बॉडी”, पायी जाती है. “लुइ बॉडी” की उपस्थिति के महत्त्व को समझने की कोशिश जारी है. कुछ विशेषज्ञों का विचार है कि “पार्किन्संस रोग डिमेंशिया” और  “डिमेंशिया विथ लुइ बॉडीज” मस्तिष्क में एक खास प्रोटीन से संबंधित एक विकार के दो अलग रूप हैं. इन दोनों में अग्रिम अवस्था में लक्षण और भी सामान होते जाते हैं.

वर्तमान रोग-निदान प्रणाली के हिसाब से “पार्किन्संस रोग डिमेंशिया” और  “डिमेंशिया विथ लुइ बॉडीज”, दोनों एक श्रेणी (“लुइ बॉडी डिमेंशिया”, Lewy Body Dementia) के अंतर्गत दो अलग रोग-निदान हैं. कौन से लक्षण किस क्रम में होते हैं, रोग-निदान में इस्तेमाल नाम उस पर निर्भर है. यह नाम मिलते जुलते हैं, और कुछ डॉक्टर कभी किसी नाम का इस्तेमाल करते हैं, कभी किसी दूसरे नाम का. परिवारों के लिए यह काफी कन्फ्यूजन पैदा करता है.

परिवार वालों को इस बात से कोई खास वास्ता नहीं है कि मस्तिष्क के सेल में क्या नुकसान हो रहा है, या  विशेषज्ञ किस नाम पर सहमत होंगे. वे यह जानना चाहते हैं कि व्यक्ति को किस किस तरह की दिक्कतें हो सकती हैं, किस तरह के उपचार संभव हैं, और देखभाल कैसे करनी होगी. इस के लिए पार्किंसंस रोग और डिमेंशिया के बीच के सम्बन्ध पर कुछ मुख्य तथ्य :

  • पार्किंसन रोगी के केस में: यदि किसी को पार्किंसन रोग है, तो आम-तौर से पहचाने जाने वाले शारीरिक पार्किंसन किस्म के लक्षणों के अलावा व्यक्ति में दूसरे लक्षण भी होते हैं. व्यक्ति में डिमेंशिया पैदा होने की  ऊंची संभावना है.
  • डिमेंशिया के लक्षण होने पर: डिमेंशिया वाले व्यक्तियों में पार्किंसन के लक्षण भी हो सकते हैं. पार्किंसन किस्म के लक्षण की समस्या “डिमेंशिया विथ लुइ बॉडीज” वाले लोगों में आम है, और कुछ अन्य प्रकार के डिमेंशिया में भी हो सकती है
  • डॉक्टर से जानकारी और सलाह: डॉक्टर स्थिति के अनुसार तय करेंगे कि व्यक्ति को किन लक्षणों में कैसे राहत देने की कोशिश करें. वे देखेंगे कि लक्षण कितने गंभीर हैं और किस क्रम में पेश हुए हैं. रोग-निदान भी डॉक्टर उसी अनुसार देंगे. परिवार वालों को डॉक्टर से खुल कर बात कर लेनी चाहिए ताकि वे देखभाल के लिए तैयार हो पायें.

अधिक जानकारी के लिए रेफरेंस/ हिंदी में जानकारी:

अधिक जानकारी के लिए रेफरेंस: कुछ उपयोगी, विश्वसनीय अंग्रेजी वेब साईट और पृष्ठ:

डिमेंशिया से सम्बंधित अन्य रोगों पर हिंदी में विस्तृत पृष्ट देखें:

चित्रों का श्रेय: कोशिका में लुई बॉडी का चित्र: Marvin 101 (Own work) [CC BY-SA 3.0] (Wikimedia Commons) पार्किंसन के व्यक्ति का चित्र: By Sir_William_Richard_Gowers_Parkinson_Disease_sketch_1886.jpg: derivative work: Malyszkz [Public domain], via Wikimedia Commons

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डिप्रेशन (अवसाद) और डिमेंशिया (Depression and Dementia)

पिछले कुछ सालों में मीडिया में डिप्रेशन पर ज्यादा खुल कर चर्चा होने लगी है, खास-तौर से दीपिका पादुकोण और करण जौहर जैसी मशहूर हस्तियों के अनुभव सुनकर. पर डिप्रेशन के एक पहलू पर अब भी चर्चा कम है — डिप्रेशन का अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से सम्बन्ध.

रिसर्च के अनुसार डिप्रेशन (अवसाद) और डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के बीच में सम्बन्ध है. यह पाया गया है कि जिन लोगों में डिप्रेशन है, उनमें (आम व्यक्तियों के मुकाबले) डिमेंशिया ज्यादा देखा जाता है. इस पोस्ट में:

डिप्रेशन के बारे में

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कई लोग किसी बुरी घटना के बाद हुई उदासी या निराशा के लिए “डिप्रेशन” शब्द का इस्तेमाल करते हैं. पर बुरी घटनाओं से उदास होना एक सामान्य प्रक्रिया है. चिकित्सीय (मेडिकल) भाषा में “डिप्रेशन (अवसाद)” एक ऐसा मानसिक विकार है जिस में उदासी, निराश, अरुचि जैसी भावनाएं कम से कम दो हफ्ते से मौजूद हैं, और जिन के कारण व्यक्ति के जीवन में बाधा होती है. इस में इलाज की जरूरत है.

डिप्रेशन (अवसाद) किसी को भी हो सकता है. डिप्रेशन में व्यक्ति उदास रहते हैं, पसंद वाली गतिविधियों में रुचि खो देते हैं, ठीक से सो नहीं पाते, ठीक से खा नहीं पाते, और थके-थके रहते हैं. उन्हें ध्यान लगाने में दिक्कत होती है. सोच नकारात्मक हो जाती है. किसी भी काम में आनंद नहीं आता. वे खुद को दोषी समझते हैं. आत्मविश्वास कम हो जाता है. रोज के साधारण काम करने का मन नहीं होता. वे सामाजिक और व्यवसाय संबंधी काम भी नहीं करना चाहते. कुछ डिप्रेशन से ग्रस्त व्यक्ति इतने निराश हो जाते हैं कि आत्महत्या करना चाहते हैं.

डिप्रेशन का प्रकरण (depressive episode, डिप्रेसिव एपिसोड) कम से कम दो हफ्ते लम्बे होता है, पर अधिक लंबा भी हो सकता है. व्यक्ति को ऐसे एपिसोड बार-बार हो सकते हैं.

डिप्रेशन के लिए इलाज उपलब्ध हैं, जैसे कि अवसाद-निरोधी दवा और अनेक प्रकार की थैरेपी और गैर-दवा वाले उपचार. और अगर डिप्रेशन किसी अन्य बीमारी के कारण हुआ है (जैसे कि थाइरोइड हॉर्मोन की कमी), तो उस बीमारी को ठीक करने से डिप्रेशन दूर हो सकता है. उचित उपचार और जीवन शैली में बदलाव से अधिकाँश लोगों को डिप्रेशन से आराम मिल पाता है और वे सामान्य जीवन बिता पाते हैं.

(डिप्रेशन पर हिंदी में कुछ और जानकारी के लिए नीचे “अधिक जानकारी के लिए रेफेरेंस और उपयोगी संसाधन” में लिंक हैं)

डिमेंशिया के बारे में

डिमेंशिया एक ऐसा लक्षणों का समूह है जिस में व्यक्ति की याददाश्त में, सोचने-समझने और तर्क करने की क्षमता में, व्यक्तित्व, मनोभाव (मूड) और व्यवहार में, बोलने में, और अनेक अन्य मस्तिष्क से संबंधी कामों में दिक्कत होती है. इन लक्षणों के कारण व्यक्ति को दैनिक कार्यों में दिक्कत होती है, और यह दिक्कत समय के साथ बढ़ती जाती है. व्यक्ति अकेले अपने काम नहीं कर पाते. दूसरों पर निर्भरता बढ़ती जाती है.

डिमेंशिया किसी को भी हो सकता है, पर बड़ी उम्र के लोगों में ज्यादा पाया जाता है. ध्यान रखें, डिमेंशिया उम्र बढ़ने की सामान्य प्रक्रिया नहीं है. यह मस्तिष्क में हुई हानि के कारण होता है—जैसे कि मस्तिष्क के सेल का नष्ट होना, सेल के बीच के कनेक्शन में नुकसान, और मस्तिष्क का सिकुड़ना. ऐसे कई रोग हैं जिन में मस्तिष्क में इस तरह की हानि हो सकती है. चार रोग मुख्य हैं: अल्ज़ाइमर रोग, संवहनी डिमेंशिया, लुइ बॉडी डिमेंशिया, और फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया. अब तक ऐसी कोई दवा उपलब्ध नहीं है जिस से मस्तिष्क की हानि ठीक हो सके. डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति फिर से सामान्य नहीं हो सकते. डिमेंशिया के अंतिम चरण तक पहुँचते-पहुँचते व्यक्ति पूरी तरह निष्क्रिय और निर्भर हो जाते हैं.

(डिमेंशिया पर हिंदी में विस्तृत जानकारी के लिए नीचे “अधिक जानकारी के लिए रेफेरेंस और उपयोगी संसाधन” में लिंक हैं)

डिप्रेशन और डिमेंशिया के बीच का सम्बन्ध

रिसर्च से यह तो पता चल पाया है कि डिमेंशिया और डिप्रेशन में सम्बन्ध है, पर यह सम्बन्ध क्या है, इस पर अभी पूरी जानकारी नहीं मिल पाई है. शोध जारी है. अब तक के रिसर्च के आधार पर विशेषज्ञ मानते हैं कि डिमेंशिया और डिप्रेशन के बीच कई तरह के सम्बन्ध हैं.

डिप्रेशन डिमेंशिया का एक कारक माना जाता है.  डिप्रेशन वाले व्यक्ति में डिमेंशिया होने से संभावना ज्यादा है. कुछ विशेषज्ञों की राय है कि यह इस लिए है क्योंकि डिप्रेशन में मस्तिष्क में कई बदलाव होते हैं, और संवहनी समस्याएँ (नाड़ी संबंधी समस्याएँ) भी हो सकती हैं, और इन बदलाव के कारण डिमेंशिया की संभावना ज्यादा होती है. सब डिप्रेशन वाले लोगों को डिमेंशिया नहीं होगा, पर उन में डिमेंशिया की संभावना दूसरों के मुकाबले ज्यादा है.

डिप्रेशन को डिमेंशिया के एक लक्षण के रूप में पहचाना गया है. यह सबसे पहले प्रकट होने वाले लक्षणों में भी शामिल हो सकता है.  विशेषज्ञों के अनुसार डिमेंशिया में हुए मस्तिष्क में बदलाव के कारण जो लक्षण होते हैं, उनमें से डिप्रेशन भी एक संभव लक्षण है.  यानी कि, डिमेंशिया का एक संभव नतीजा है डिप्रेशन, और हम डिमेंशिया को डिप्रेशन का कारक समझ सकते हैं

अन्य प्रकार के सम्बन्ध: डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति को कई दिक्कतें होती हैं और व्यक्ति सामान्य जीवन नहीं बिता पाते. व्यक्ति अपनी कम हो रही कार्यक्षमता से बहुत मायूस हो सकते हैं, और नतीजन उन्हें डिप्रेशन हो सकता है. डिप्रेशन और डिमेंशिया के बीच अन्य प्रकार के सम्बन्ध भी संभव हैं, जिन में किसी दूसरी ही वजह से डिप्रेशन और डिमेंशिया साथ साथ नजर आ रहे हैं (सह-विद्यमान हैं, co-existing).

कोशिश करें कि डिप्रेशन के प्रति सतर्क रहें, खासकर बड़ी उम्र के लोगों में

डिप्रेशन का व्यक्ति पर बहुत गंभीर असर पड़ता है, इस लिए इस के प्रति सतर्क रहना और सही निदान और उपचार पाना जरूरी है. पर समाज में जागरूकता कम होने के कारण  लोग अक्सर इसे पहचान नहीं पाते और डॉक्टर की सलाह नहीं लेते.

वृद्ध लोगों में सही निदान की समस्या अधिक है, क्योंकि डिप्रेशन के लक्षण देखने पर परिवार वाले सोचते हैं कि व्यक्ति रिटायर हो चुके  हैं या बूढ़े हैं इस लिए गुमसुम रहते हैं और गतिविधियों में भाग नहीं लेते.

डिप्रेशन के प्रति सतर्क रहने के और जल्द-से-जल्द डॉक्टर से संपर्क करने के कई फायदे हैं:

  • यदि व्यक्ति को डिप्रेशन है, तो उपचार से फायदा हो सकता है. डिप्रेशन का इलाज संभव है, तो व्यक्ति व्यर्थ में तकलीफ क्यों सहे!
  • डिप्रेशन को पहचानने से और उचित इलाज से डिमेंशिया की संभावना कम करी जा सकती है. बड़ी उम्र के लोगों में डिप्रेशन और डिमेंशिया का सम्बन्ध खास तौर से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि डिमेंशिया का खतरा वृद्धों में ज्यादा होता है. यदि पता हो कि व्यक्ति को  डिप्रेशन है तो डॉक्टर और परिवार वाले व्यक्ति में डिमेंशिया के लक्षण के लिए ज्यादा सतर्क रह सकते हैं
  • यदि व्यक्ति को डिप्रेशन और डिमेंशिया दोनों हैं, तो डॉक्टर डिप्रेशन के उपचार के अलावा डिमेंशिया का रोग-निदान भी कर पायेंगे, और डिमेंशिया के बारे में जानकारी और सलाह भी दे पायेंगे. परिवार वाले भी व्यक्ति की स्थिति ज्यादा अच्छी तरह समझ सकते हैं और देखभाल के लिए सही इंतजाम कर सकते हैं
  • डिप्रेशन का सम्बन्ध अन्य भी कुछ बीमारियों से है, जैसे कि हृदय रोग. इस लिए डिप्रेशन के रोग-निदान और इलाज से दूसरे स्वास्थ्य-संबंधी फायदे भी हैं.

अधिक जानकारी के लिए रेफेरेंस और उपयोगी संसाधन

डिमेंशिया से सम्बंधित अन्य रोगों पर हिंदी में विस्तृत पृष्ट देखें:

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भारत में डिमेंशिया, 2015: भविष्य के लिए अनुमान

समय के साथ साथ भारत में डिमेंशिया (मनोभ्रंश) से ग्रस्त लोगों की संख्या बढ़ रही है और परिवारों पर डिमेंशिया और सम्बंधित देखभाल का असर भी बढ़ रहा है.

भारत में वृद्धों की संख्या बढ़ रही है. लोग दीर्घायु हो रहे हैं. 1950-55 में जन्म पर जीवन प्रत्याशा सिर्फ 36.62 साल थी, पर 2010-2015 में यह बढ़कर 67.47 हो गयी है और अनुमान है कि 2045-2040 तक यह 75.87 साल होगी. नतीजतन, कुल आबादी में 60+ आयु वाले लोगों का प्रतिशत भी बढ़ेगा. 2015 में यह 8.9% है, और अनुमान है कि 2050 में यह अनुपात 19.4% हो जाएगा. यह इतना बड़ा फर्क है कि अपने चारों तरफ देखने से स्पष्ट होगा कि आबादी में वृद्ध लोग ज्यादा हैं. कुछ लोग इस तथ्य को “India is greying” या “India is ageing” कह कर व्यक्त करते हैं (“भारत बूढ़ा हो रहा है”).

उम्र बढ़ने पर डिमेंशिया होने का खतरा भी बढ़ जाता है. हर 6.6 साल उम्र बढ़ने से डिमेंशिया का खतरा दुगना हो जाता है. 60 साल से कम उम्र के लोगों में डिमेंशिया बहुत ही कम पाया जाता है. आयु वर्ग 60-65 में 1.9% लोगों में डिमेंशिया पाया जाता है, पर 85-89 आयु वर्ग में अनुमान है कि 23% लोगों को डिमेंशिया होता है, और 90+ आयु वर्ग में तो यह 44.1% है.

दोनों बातों को जोड़ें तो स्थिति की गंभीरता और स्पष्ट नज़र आने लगती है. हमारी आबादी में वृद्ध लोगों की संख्या और अनुपात बढ़ रहे हैं, और वृद्ध लोगों को डिमेंशिया होने का ज्यादा खतरा है. वर्ष 2050 के लिए अनुमान है कि डिमेंशिया से ग्रस्त लोग तकरीबन 133.3 लाख होंगे, जो वर्तमान के मुकाबले 225% की वृद्धि है. इसके मुकाबले कुल आबादी सिर्फ 30% बढ़ेगी. यानि कि अधिक परिवारों में डिमेंशिया वाले व्यक्ति होंगे, और डिमेंशिया संबंधी सहायता और सेवाओं की जरूरत बहुत बढ़ेगी.

भविष्य में भारत में डिमेंशिया कितना अधिक होगा, इसका चित्रण नीचे देखें. यह चित्र एक चार-भाग वाले इन्फोग्राफिक का तीसरा भाग है.

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ब्लॉग पोस्ट से संबंधित कुछ लिंक

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विश्व अल्ज़ाइमर दिवस 2015 के अवसर पर डिमेंशिया देखभाल पर कुछ विचार

दुनिया भर में सितम्बर का महीना “विश्व अल्ज़ाइमर माह” (World Alzheimer’s Month) के रूप में मनाया जाता है, और सितम्बर 21 “विश्व अल्ज़ाइमर दिवस” (World Alzheimer’s Day) के रूप में मनाया जाता है. (अल्जाइमर रोग डिमेंशिया के लक्षण पैदा करने वाले रोगों में मुख्य है). इस महीने विशेषज्ञ और स्वयंसेवक अनेक कार्यक्रमों द्वारा डिमेंशिया और संबंधित देखभाल के बारे में जानकारी फैलाने का खास प्रयत्न करते हैं. अखबारों और पत्रिकाओं में भी डिमेंशिया पर लेख प्रकाशित होते हैं. इस ब्लॉग पोस्ट द्वारा मैं भी डिमेंशिया देखभाल के बारे में कुछ बांटना चाहती हूँ.

यदि आप डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं तो आप शायद अन्य देखभाल करने वाले परिवारों के अनुभव जानना चाहते होंगे. आप यह जानना चाहते होंगे कि आपके प्रियजन को किस प्रकार की समस्याएँ हो सकती है, देखभाल के क्या तरीके हैं, लोग तनाव से कैसे बचते हैं, देखभाल की योजना कैसे बनाते हैं.

यूं समझिए, डिमेंशिया देखभाल एक सालों लंबा सफर है. परिवार वालों को व्यक्ति की समस्याएं समझने में समय लगता है. स्थिति स्वीकारने में, और उचित सहायता के तरीके ढूंढ़ने में और बदलाव करने में टाइम लगता है, मेहनत करनी पड़ती है. गलतियों होती हैं, निराशा होती है, एक दूसरे पर गुस्सा आता है. धीरे धीरे हालत सुधरने लगती है और परिवार वाले सोचते हैं कि शुक्र है, अब तो सब ठीक-ठाक चलने लगा है. फिर व्यक्ति का डिमेंशिया कुछ नई समस्या पैदा कर देता है, हालत और बिगड़ जाती है. परिवार वालों को समझने और तरीके ढूंढ़ने का सिलसिला फिर शुरू करना पड़ता है. देखभाल के इस सफर में उतार-चढ़ाव होते ही रहते हैं. और हर परिवार में स्थिति और उपाय अलग होते हैं.

अन्य परिवारों के देखभाल संबंधी अनुभव जानने से फायदा हो सकता है, पर ऐसे अनुभव जान पाना आसान नहीं है.

किसी देखभाल कर्ता से पूछें कि देखभाल करने का आपका अनुभव क्या है, तो वे वही कहेंगे जो उन्हें उस पल याद आता है, और जो वे बेझिझक बाँट सकते हैं. सालों-साल चलने वाले डिमेंशिया का निचोड़ यकायक चंद वाक्य में कोई कैसे दे! स्वाभाविक है कि कई लोग हाल में हुई घटनाओं पर या अभी हो रही समस्याओं पर बात करेंगे. एक महीने बाद यदि आप उन से फिर पूछें, तो वे शायद उस घटना का जिक्र ही न करें, या किसी नई समस्या के बारे में बात करें, जो अब उन्हें परेशान कर रही है. डिमेंशिया किस अवस्था में है, परिवार का अनुभव इस पर निर्भर है. डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति शुरूआती अवस्था में हो तो परिवार वाले कुछ कहेंगे, और अंतिम अवस्था हो तो कुछ और कहेंगे.

शर्म और झिझक अनुभव बांटने में बाधा पैदा करते हैं. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो लोग दूसरों को इसलिए नहीं बताएँगे क्योंकि उन्हें शर्म आती है, या उन्हें लगता है कि सुनने वाले उनकी निंदा करेंगे या उन्हें हीन या नालायक समझेंगे. खुल कर लोग तभी बात कर पाते हैं जब कि माहौल उन्हें सुरक्षित लगे और उन्हें भरोसा हो कि कोई उनकी बात लेकर उनकी निंदा नहीं करेगा.

सब परिवारों के अनुभव अलग होते हैं. यदि यह जानना हो कि डिमेंशिया में किस किस तरह के अनुभव हो सकते है तो कई लोगों से बात करनी होगी. सिर्फ एक या दो प्रकाशित लेखों को पढ़कर आपको सही और पूरी जानकारी नहीं मिल सकती. ये लेख कुछ परिवारों के कुछ अनुभव प्रस्तुत करते हैं. लेख आपके लिए कितना उपयोगी है यह इस पर निर्भर है कि रिपोर्टर ने किस इरादे से लेख लिखा है. और लेख में जो पेश है वह सिर्फ एक झलक है, क्योंकि रिपोर्टर ने तो सिर्फ कुछ परिवार चुने हैं, और उनकी बातों से सिर्फ वे कुछ अंश चुने हैं जो लेख में फिट हो रहे थे. वैसे भी कई लोग इंटरव्यू में खुल कर नहीं बोलते. शायद आप के लिए जिन देखभाल करने वालों के अनुभव उपयोगी हो सकते थे उनका इंटरव्यू न हुआ हो. शायद लेख में जो प्रस्तुत है वह अंश आपके मतलब का न हो, या आपको गलत जानकारी दे.

यदि आपको डिमेंशिया के अनुभवों के बारे में ठीक से जानकारी चाहिए तो आपको अनेक परिवारों की कहानियाँ जाननी होंगे. लेख, किताबें, ब्लॉग पढ़ने होंगे. अन्य देखभाल करने वालों से बात करनी होगी. अपनी कहानी बांटनी होगे, और दूसरों की कहानी सुननी होगी. समर्थक समुदाय में भाग लेना होगा. जितने ज्यादा परिवार वाले आपस में खुल कर बात करें, उतना ही अच्छा होगा. समुदाय के तौर पर हम सभी एक दूसरे की मदद कर सकते हैं, समर्थन दे सकते हैं.

मैं भी कई साल तक देखभाल कर्ता रह चुकी हूँ. अपने निजी अनुभव से मैं जानती हूँ कि डिमेंशिया और देखभाल के सफर में उचित जानकारी से देखभाल आसान और कारगर हो सकती है, और तनाव और अकेलापन भी कम हो जाता है. दूसरों के किस्से सुनने से मुझे माँ के डिमेंशिया को स्वीकारने में आसानी हुई थी, और उपयोगी सुझाव भी मिले थे. मैंने भी अपने अनुभव खुल कर ब्लॉग और वीडियो द्वारा बांटे हैं. और अपने डिमेंशिया वेबसाइट पर मैंने अनेक देखभाल करने वालों के विस्तृत इंटरव्यू प्रकाशित करे हैं. अखबारों में और अन्य ब्लॉग और साईट पर उपलब्ध देखभाल की कहानियों के लिंक भी एकत्रित करे हैं. डिमेंशिया देखभाल के क्षेत्र में यह मेरा एक योगदान है. कुछ लिंक:

Alzheimer’s and the brain अल्ज़ाइमर रोग में मस्तिष्क के बदलाव: एक चित्रण

अल्ज़ाइमर रोग(Alzheimer’s Disease) डिमेंशिया (मनोभ्रंश) का एक आम कारण है. इस रोग में मस्तिष्क में किस प्रकार हानि होती है, और समय के साथ यह कैसे बढ़ती है, उसका एक चित्रण, National Institute on Aging के सौजन्य से:

Alzheimers disease-brain shrinkage

Late stage dementia care अंतिम अवस्था में डिमेंशिया देखभाल

late stage dementia patients are bedridden and fully dependent on caregivers

मेरी माँ का डिमेंशिया सफर कई सालों तक चला और आखिर के ढाई साल वे पूरी तरह बिस्तर पर ही थीं. इस अवस्था में देखभाल खासतौर पर मुश्किल होती हैं. वे चबा नहीं पाती थीं इसलिए हम उन्हें सूप, जूस, पतली दाल, छाछ देते. निगलने में दिक्कत थी इसलिए खयाल रखना होता था कि खाना पेट में ही जाए, गलती से फेफड़ों में न जाए. बेड सोर न हों इसलिए हर दो तीन घंटों में करवट बदलते थे. वे यह भी नहीं बता पाती थीं कि उन्हें क्या कहीं दर्द हो रहा है या कुछ तकलीफ है–हम इसका अंदाजा उनके हाव-भाव और शरीर हिलाने के तरीके से ही लगा पाते थे. उनको इस स्थिति में देखना बहुत मुश्किल हो जाता था.

कई देशों में इस अवस्था में देखभाल खास बनाए गए रिस्पाईट केयर (respite care) या ओल्ड एज होम (old age home) में होती है पर भारत में हम यह अंतिम चरण की देखभाल अपने घरों में ही करते हैं. देखभाल कैसे करें, इस विषय पर जानकारी आसानी से नहीं मिल पाती. क्योंकि डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति अपनी मर्जी बता नहीं पाते, देखभाल में अनेक चुनौतियों का सामना करना होता है. कई कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं.

इस विषय पर देखभाल करने वालों के लिए हिंदी में विस्तृत चर्चा का एक पृष्ठ: अग्रिम/ अंतिम अवस्था में देखभाल (Late-stage dementia care).


माँ की देखभाल के अंतिम चरण के मेरे निजी अनुभव मैंने विस्तार में अपने अंग्रेज़ी ब्लॉग पर इस श्रेणी में लिखे हैं: Late stage care.

My mother and wandering डिमेंशिया और माँ का भटकना

शुरू शुरू में जान-पहचान के लोग इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे कि मेरी माँ को कुछ दिक्कतें हो रही हैं, क्योंकि माँ अपनी दिक्कतों को छुपा पाती थीं. कभी कभी अगर कुछ कंफ्यूज़ भी हो जाती थीं, तो बात बदल देती थीं. चौबीस घंटे साथ रहने वालों को तो साफ पता चलता था कि उनमें काफी बदलाव है, पर दस पन्द्रह मिनट के लिए मिलने वालों को तो वे सामान्य ही दिखती थीं.

इसका नतीजा यह था कि उन्हें माँ से वैसी ही उम्मीद होती थी जैसे कि सालों पहले थी. और वे सोचते थे कि माँ की देखभाल भी वैसे ही होनी चाहिए जैसे अन्य बुजुर्गों की.

माँ के कमरे का एक दरवाजा सीधे घर के बाहर के कॉरिडोर में खुलता था. जब बाहर कोई चल रहा होता था या लोग आपस में बात करते हुए गुजारते थे, तो माँ अक्सर सोचती थीं कि कोई उन्हें बुला रहा है या कोई मिलने वाला आ रहा है. वे तुरंत उठकर दरवाजा खोलकर बाहर निकल जातीं. बाहर जाने के बाद कोई नज़र नहीं आता तो वे भूल जातीं कि किसलिए निकली थीं और इधर उधर टहलने लगतीं. गर्मी में धूप में, लू में घूमती रहतीं. सर्दी में बिना गरम कपड़ों के निकल जातीं. वे यह भूल जातीं कि उनका संतुलन ठीक नहीं था, और बिना किसी सहायता के सीढ़ियों से उतरने की कोशिश करतीं.

मुझे बहुत सतर्क रहना पड़ता था. दरवाजा खुलने की आवाज़ सुनते ही मैं भागती कि कहीं बाहर जाकर सीढ़ियों पर गिर न जाएँ, लू न लग जाए, ठंड न लग जाए. उन्हें बहला कर धीरे से वापस अंदर लाती. कभी कभी तो वे खुशी खुशी वापस आ जातीं, कभी जिद्द करतीं कि जरूर कोई मिलने आया था. मुझसे नाराज़ होने लगतीं कि मैं उन्हें लोगों से मिलने नहीं दे रही.

मैं समझाती कि कोई मिलने आएगा तो घंटी बजाएगा, ऐसे बिना मिले थोड़े ही चला जाएगा, आपको इतनी जल्दी दरवाजा खोलने की जरूरत नहीं है. मैं खोल दूंगी, आप क्यों परेशान होती हैं! वे कभी कभी समझ जातीं और मान भी लेतीं, पर फिर जब आवाज़ सुनतीं तो दरवाजे की तरफ लपकतीं. मैं अंदर से चटकनी लगाती तब भी वे उसे तेजी से खोल कर निकल जातीं. काफी बार हादसे होते होते बचे. एक दो बार उन्हें लू लग गयी और वे बीमार पड़ गयीं. मैं क्या करती? और नहीं सूझा तो मजबूरन मैंने उनके दरवाजे में अंदर से ताला लगाना शुरू कर दिया, यह बहाना बनाकर कि शहर में खून खराबे के वारदात बहुत बढ़ गए हैं, और बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए यह पुलिस का सुझाव है.

माँ तो शायद मान जातीं, पर जान पहचान वाले उन्हें उकसाने लगे. वे कहने लगे, आपकी बेटी ने तो आपको कैद कर रखा है, आप यह कैसे बर्दाश्त कर रही हैं. हम तो अपने बच्चों से ऐसी पाबंदी मंजूर नहीं करते. आप जब मर्जी जहाँ मर्जी बेझिझक जाइए, बेटी की बात मत सुनिए. वे मुझे भी डांटते, कहते तुम अपनी माँ को तंग कर रही हो.

मैंने उन लोगों को बताया कि माँ को डिमेंशिया है और वे भटक सकती हैं और खो सकती हैं. यह भी बताया कि माँ कैसे एक दो बार सीढ़ियों पर लुढ़कने वाली थीं. पर वे यही सोचते कि मैं बहाने बना रही हूँ या झूठ बोल रही हूँ. कहते यह डिमेंशिया विमेंशिया कुछ नहीं है, तुम्हारी माँ बिलकुल ठीक-ठाक हैं. तुम्हारा माँ के साथ सलूक गलत है.

इस उकसाने के कारण माँ मुझसे नाराज़ रहने लगीं. एक दिन मौका पा कर घर से फिर निकल गयीं, इस इरादे से कि वे अकेली बाजार जायेंगी. निकलने के बाद वे कुछ घबरा गयीं. सीढ़ियों के पास एक लड़का खड़ा था, उन्होंने उससे कहा कि उन्हें नीचे जाना है. लड़के ने उनकी मदद कर दी. फिर उन्होंने एक रिक्शा वाले को संकेत किया और कहा उन्हें बाजार जाना है. मुझे यह सब मालूम नहीं था. मैंने जब देखा माँ कमरे में नहीं हैं, तो ढूंढ़ना शुरू किया. यह तो शुक्र है कि एक जान-पहचान वाले ने देखा कि माँ अकेली हैं और घबराई हुई लग रही हैं, और उन्हें वापस ले आया, वरना तो यह सोच के दिल दहलता है कि क्या हो सकता था.

इस हादसे के बाद भी माँ के हमउम्र दोस्त यह मानने को तैयार नहीं थे कि माँ को कोई ऐसी तकलीफ थी जिससे उन्हें कंफ्यूशन रहता था, और उनकी सलाह माँ के लिए अनुचित थी. उनका उकसाना जारी रहा.

आखिरकार मैंने माँ के लिए दिन भर साथ रहने वाली एक आया को रखा, जो उनको साथ भी देती थी और यह भी ध्यान रख पाती थी कि माँ खुद को नुकसान न पहुचाएं. मैंने अन्य भी कुछ तरीके अपनाए जिनसे उनके भटकने की प्रवृत्ति कुछ कम हुई. यदि वे कंफ्यूशन के मारे बाहर निकलने की कोशिश करती तो भी हम उन्हें समय पर रोक पाते थे.

डिमेंशिया में भटकने की समस्या आम है, और अधिकाँश डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति में पायी जाती है. इस कारण मैंने इस विषय पर अपने सुझाव एक वीडियो में रिकार्ड करे हैं. शायद यह वीडियो आपके या आपके किसी जान-पहचान वाले के काम आये:

(यदि वीडियो प्लेयर नीचे लोड नहीं होता, तो आप इसे यूट्यूब पर यहाँ देख सकते हैं.

Looking after someone with dementia डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल: एक सरल, संक्षिप्त परिचय

जब परिवार में किसी को डिमेंशिया हो जाता है, तब व्यक्ति का व्यवहार बदल सकता है, व्यक्तित्व बदल सकता है, और काम करने की क्षमता भी बदलने लगती है. यादाश्त पर असर हो सकता है, समय और स्थान का बोध शायद ठीक न रहे. अन्य लक्षण भी पेश हो सकते हैं. इन सबसे व्यक्ति के दैनिक जीवन में दिक्कत होने लगती है. इस सबको देखकर परिवार वाले घबराने लगते हैं. उन्हें समझ में नहीं आता कि वे स्थिति से कैसे जूझें, और व्यक्ति की सहायता कैसे करें.

वैसे तो डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल करने के लिए बहुत कुछ सीखना और बदलना होता है, पर इतना सब कुछ कैसे सीखें, कैसे करें, यह सोच कर भी घबराहट होने लगती है.

कुछ महीने पहले मैंने डिमेंशिया देखभाल का एक सरल परिचय slideshare.net पर अपलोड करा है. यह एक संक्षिप्त विवरण है. नोट देखने के लिए आप इसे सीधे slideshare.net पर देख सकते हैं–क्लिक करें: डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल आप इसे नीचे दिए प्लयेर में भी देख सकते हैं.

देखभाल के तरीकों पर अधिक जानने के लिए आप मेरे वेबसाइट के पृष्ठ देख सकते हैं. वेबसाइट पर देखभाल के सब पहलूओं पर जानकारी और चर्चा है, जैसे कि देखभाल का रोल क्या है, व्यक्ति के लिए घर कैसे बदलें, व्यक्ति से बातचीत कैसे करें, उनकी मदद कैसे करें, वगैरह.

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