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डिमेंशिया: एक गंभीर समस्या (सिर्फ “भूलने” की बीमारी नहीं)

अकसर लोग डिमेंशिया को सिर्फ एक भूलने की बीमारी के नाम से जानते हैं. वे सोचते हैं कि याददाश्त की समस्या ही डिमेंशिया का एकमात्र या प्रमुख लक्षण है. पर याददाश्त की समस्या तो डिमेंशिया के लक्षणों में से सिर्फ एक है– डिमेंशिया के अनेक गंभीर और चिंताजनक लक्षण होते हैं, जिन का डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के जीवन के हरेक पहलू पर असर होता है. व्यक्ति को अपने साधारण दैनिक कार्यों में दिक्कतें होती हैं, और ये दिक्कतें समय के साथ बढ़ती जाती हैं. सहायता की जरूरत भी बढ़ती जाती है, और देखभाल का काम मुश्किल होता जाता है.

इस हिंदी प्रेजेंटेशन में देखिये डिमेंशिया क्या है, इस में मस्तिष्क में कैसी हानि होती है, लक्षण क्या हैं, और समय के साथ क्या होता है, और यह किस किस प्रकार का हो सकता है. इस के इलाज संभव हैं या नहीं, और इस की संभावना कम करने के लिए डॉक्टर क्या सुझाव देते हैं, इस पर भी स्लाइड हैं. देखभाल करने वालों को क्या करना होता है, इस पर चर्चा देखिये. इस प्रेजेंटेशन में उदाहरण और चित्र भी हैं.

हिंदी में इसे स्लाईड शेयर (Slideshare) पर देखें — यदि प्लेयर नीचे लोड न हो रहा हो तो यहाँ क्लिक करें: डिमेंशिया क्या है?(What is Dementia)

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भारत में डिमेंशिया, 2015: देखभाल की चुनौतियाँ (एक चित्रण)

भारत में डिमेंशिया (मनोभ्रंश) से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल का काम अधिकाँश केस में उस व्यक्ति के परिवार वाले संभालते हैं.

डिमेंशिया का सफर कई साल चलता है. इस दौरान व्यक्ति की क्षमताएं घटती जाती हैं, और निर्भरता बढ़ती जाती है. शुरू में तो ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं होती, पर व्यक्ति का हाल बिगड़ता रहता है और समय के साथ साथ अधिक सतर्कता और मदद की जरूरत होने लगती है.

देखभाल करने में अनेक प्रकार की दिक्कतें होती हैं. देखभाल के लिए अधिक पैसे और समय की जरूरत होने लगती है. पर देखभाल कैसे करें, इसके लिए क्या प्लान करें, आगे क्या क्या हो सकता है, इस सब को समझने के लिए जरूरी जानकारी नहीं मिल पाती. सेवाएँ और सहायता भी नहीं उपलब्ध हैं. देखभाल करने वाले अकेले पड़ जाते हैं, थक जाते हैं, आर्थिक समस्याओं का सामना करते हैं, और समाज की निंदा भी सहते हैं. अनेक देखभाल करने वाले डिप्रेशन और तनाव से ग्रस्त होते हैं.

भारत में डिमेंशिया देखभाल की सच्चाइयों का एक चित्रण नीचे पेश है. इसमें भारत में देखभाल की स्थिति और चुनौतियों को दिखाया गया है. यह चित्र एक चार-भाग वाले इन्फोग्राफिक का दूसरा भाग है.

नीचे देखें: भारत में डिमेंशिया देखभाल की चुनौतियाँ:

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ब्लॉग पोस्ट से संबंधित कुछ लिंक

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विश्व अल्ज़ाइमर दिवस 2015 के अवसर पर डिमेंशिया देखभाल पर कुछ विचार

दुनिया भर में सितम्बर का महीना “विश्व अल्ज़ाइमर माह” (World Alzheimer’s Month) के रूप में मनाया जाता है, और सितम्बर 21 “विश्व अल्ज़ाइमर दिवस” (World Alzheimer’s Day) के रूप में मनाया जाता है. (अल्जाइमर रोग डिमेंशिया के लक्षण पैदा करने वाले रोगों में मुख्य है). इस महीने विशेषज्ञ और स्वयंसेवक अनेक कार्यक्रमों द्वारा डिमेंशिया और संबंधित देखभाल के बारे में जानकारी फैलाने का खास प्रयत्न करते हैं. अखबारों और पत्रिकाओं में भी डिमेंशिया पर लेख प्रकाशित होते हैं. इस ब्लॉग पोस्ट द्वारा मैं भी डिमेंशिया देखभाल के बारे में कुछ बांटना चाहती हूँ.

यदि आप डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं तो आप शायद अन्य देखभाल करने वाले परिवारों के अनुभव जानना चाहते होंगे. आप यह जानना चाहते होंगे कि आपके प्रियजन को किस प्रकार की समस्याएँ हो सकती है, देखभाल के क्या तरीके हैं, लोग तनाव से कैसे बचते हैं, देखभाल की योजना कैसे बनाते हैं.

यूं समझिए, डिमेंशिया देखभाल एक सालों लंबा सफर है. परिवार वालों को व्यक्ति की समस्याएं समझने में समय लगता है. स्थिति स्वीकारने में, और उचित सहायता के तरीके ढूंढ़ने में और बदलाव करने में टाइम लगता है, मेहनत करनी पड़ती है. गलतियों होती हैं, निराशा होती है, एक दूसरे पर गुस्सा आता है. धीरे धीरे हालत सुधरने लगती है और परिवार वाले सोचते हैं कि शुक्र है, अब तो सब ठीक-ठाक चलने लगा है. फिर व्यक्ति का डिमेंशिया कुछ नई समस्या पैदा कर देता है, हालत और बिगड़ जाती है. परिवार वालों को समझने और तरीके ढूंढ़ने का सिलसिला फिर शुरू करना पड़ता है. देखभाल के इस सफर में उतार-चढ़ाव होते ही रहते हैं. और हर परिवार में स्थिति और उपाय अलग होते हैं.

अन्य परिवारों के देखभाल संबंधी अनुभव जानने से फायदा हो सकता है, पर ऐसे अनुभव जान पाना आसान नहीं है.

किसी देखभाल कर्ता से पूछें कि देखभाल करने का आपका अनुभव क्या है, तो वे वही कहेंगे जो उन्हें उस पल याद आता है, और जो वे बेझिझक बाँट सकते हैं. सालों-साल चलने वाले डिमेंशिया का निचोड़ यकायक चंद वाक्य में कोई कैसे दे! स्वाभाविक है कि कई लोग हाल में हुई घटनाओं पर या अभी हो रही समस्याओं पर बात करेंगे. एक महीने बाद यदि आप उन से फिर पूछें, तो वे शायद उस घटना का जिक्र ही न करें, या किसी नई समस्या के बारे में बात करें, जो अब उन्हें परेशान कर रही है. डिमेंशिया किस अवस्था में है, परिवार का अनुभव इस पर निर्भर है. डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति शुरूआती अवस्था में हो तो परिवार वाले कुछ कहेंगे, और अंतिम अवस्था हो तो कुछ और कहेंगे.

शर्म और झिझक अनुभव बांटने में बाधा पैदा करते हैं. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो लोग दूसरों को इसलिए नहीं बताएँगे क्योंकि उन्हें शर्म आती है, या उन्हें लगता है कि सुनने वाले उनकी निंदा करेंगे या उन्हें हीन या नालायक समझेंगे. खुल कर लोग तभी बात कर पाते हैं जब कि माहौल उन्हें सुरक्षित लगे और उन्हें भरोसा हो कि कोई उनकी बात लेकर उनकी निंदा नहीं करेगा.

सब परिवारों के अनुभव अलग होते हैं. यदि यह जानना हो कि डिमेंशिया में किस किस तरह के अनुभव हो सकते है तो कई लोगों से बात करनी होगी. सिर्फ एक या दो प्रकाशित लेखों को पढ़कर आपको सही और पूरी जानकारी नहीं मिल सकती. ये लेख कुछ परिवारों के कुछ अनुभव प्रस्तुत करते हैं. लेख आपके लिए कितना उपयोगी है यह इस पर निर्भर है कि रिपोर्टर ने किस इरादे से लेख लिखा है. और लेख में जो पेश है वह सिर्फ एक झलक है, क्योंकि रिपोर्टर ने तो सिर्फ कुछ परिवार चुने हैं, और उनकी बातों से सिर्फ वे कुछ अंश चुने हैं जो लेख में फिट हो रहे थे. वैसे भी कई लोग इंटरव्यू में खुल कर नहीं बोलते. शायद आप के लिए जिन देखभाल करने वालों के अनुभव उपयोगी हो सकते थे उनका इंटरव्यू न हुआ हो. शायद लेख में जो प्रस्तुत है वह अंश आपके मतलब का न हो, या आपको गलत जानकारी दे.

यदि आपको डिमेंशिया के अनुभवों के बारे में ठीक से जानकारी चाहिए तो आपको अनेक परिवारों की कहानियाँ जाननी होंगे. लेख, किताबें, ब्लॉग पढ़ने होंगे. अन्य देखभाल करने वालों से बात करनी होगी. अपनी कहानी बांटनी होगे, और दूसरों की कहानी सुननी होगी. समर्थक समुदाय में भाग लेना होगा. जितने ज्यादा परिवार वाले आपस में खुल कर बात करें, उतना ही अच्छा होगा. समुदाय के तौर पर हम सभी एक दूसरे की मदद कर सकते हैं, समर्थन दे सकते हैं.

मैं भी कई साल तक देखभाल कर्ता रह चुकी हूँ. अपने निजी अनुभव से मैं जानती हूँ कि डिमेंशिया और देखभाल के सफर में उचित जानकारी से देखभाल आसान और कारगर हो सकती है, और तनाव और अकेलापन भी कम हो जाता है. दूसरों के किस्से सुनने से मुझे माँ के डिमेंशिया को स्वीकारने में आसानी हुई थी, और उपयोगी सुझाव भी मिले थे. मैंने भी अपने अनुभव खुल कर ब्लॉग और वीडियो द्वारा बांटे हैं. और अपने डिमेंशिया वेबसाइट पर मैंने अनेक देखभाल करने वालों के विस्तृत इंटरव्यू प्रकाशित करे हैं. अखबारों में और अन्य ब्लॉग और साईट पर उपलब्ध देखभाल की कहानियों के लिंक भी एकत्रित करे हैं. डिमेंशिया देखभाल के क्षेत्र में यह मेरा एक योगदान है. कुछ लिंक:

My mother and wandering डिमेंशिया और माँ का भटकना

शुरू शुरू में जान-पहचान के लोग इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे कि मेरी माँ को कुछ दिक्कतें हो रही हैं, क्योंकि माँ अपनी दिक्कतों को छुपा पाती थीं. कभी कभी अगर कुछ कंफ्यूज़ भी हो जाती थीं, तो बात बदल देती थीं. चौबीस घंटे साथ रहने वालों को तो साफ पता चलता था कि उनमें काफी बदलाव है, पर दस पन्द्रह मिनट के लिए मिलने वालों को तो वे सामान्य ही दिखती थीं.

इसका नतीजा यह था कि उन्हें माँ से वैसी ही उम्मीद होती थी जैसे कि सालों पहले थी. और वे सोचते थे कि माँ की देखभाल भी वैसे ही होनी चाहिए जैसे अन्य बुजुर्गों की.

माँ के कमरे का एक दरवाजा सीधे घर के बाहर के कॉरिडोर में खुलता था. जब बाहर कोई चल रहा होता था या लोग आपस में बात करते हुए गुजारते थे, तो माँ अक्सर सोचती थीं कि कोई उन्हें बुला रहा है या कोई मिलने वाला आ रहा है. वे तुरंत उठकर दरवाजा खोलकर बाहर निकल जातीं. बाहर जाने के बाद कोई नज़र नहीं आता तो वे भूल जातीं कि किसलिए निकली थीं और इधर उधर टहलने लगतीं. गर्मी में धूप में, लू में घूमती रहतीं. सर्दी में बिना गरम कपड़ों के निकल जातीं. वे यह भूल जातीं कि उनका संतुलन ठीक नहीं था, और बिना किसी सहायता के सीढ़ियों से उतरने की कोशिश करतीं.

मुझे बहुत सतर्क रहना पड़ता था. दरवाजा खुलने की आवाज़ सुनते ही मैं भागती कि कहीं बाहर जाकर सीढ़ियों पर गिर न जाएँ, लू न लग जाए, ठंड न लग जाए. उन्हें बहला कर धीरे से वापस अंदर लाती. कभी कभी तो वे खुशी खुशी वापस आ जातीं, कभी जिद्द करतीं कि जरूर कोई मिलने आया था. मुझसे नाराज़ होने लगतीं कि मैं उन्हें लोगों से मिलने नहीं दे रही.

मैं समझाती कि कोई मिलने आएगा तो घंटी बजाएगा, ऐसे बिना मिले थोड़े ही चला जाएगा, आपको इतनी जल्दी दरवाजा खोलने की जरूरत नहीं है. मैं खोल दूंगी, आप क्यों परेशान होती हैं! वे कभी कभी समझ जातीं और मान भी लेतीं, पर फिर जब आवाज़ सुनतीं तो दरवाजे की तरफ लपकतीं. मैं अंदर से चटकनी लगाती तब भी वे उसे तेजी से खोल कर निकल जातीं. काफी बार हादसे होते होते बचे. एक दो बार उन्हें लू लग गयी और वे बीमार पड़ गयीं. मैं क्या करती? और नहीं सूझा तो मजबूरन मैंने उनके दरवाजे में अंदर से ताला लगाना शुरू कर दिया, यह बहाना बनाकर कि शहर में खून खराबे के वारदात बहुत बढ़ गए हैं, और बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए यह पुलिस का सुझाव है.

माँ तो शायद मान जातीं, पर जान पहचान वाले उन्हें उकसाने लगे. वे कहने लगे, आपकी बेटी ने तो आपको कैद कर रखा है, आप यह कैसे बर्दाश्त कर रही हैं. हम तो अपने बच्चों से ऐसी पाबंदी मंजूर नहीं करते. आप जब मर्जी जहाँ मर्जी बेझिझक जाइए, बेटी की बात मत सुनिए. वे मुझे भी डांटते, कहते तुम अपनी माँ को तंग कर रही हो.

मैंने उन लोगों को बताया कि माँ को डिमेंशिया है और वे भटक सकती हैं और खो सकती हैं. यह भी बताया कि माँ कैसे एक दो बार सीढ़ियों पर लुढ़कने वाली थीं. पर वे यही सोचते कि मैं बहाने बना रही हूँ या झूठ बोल रही हूँ. कहते यह डिमेंशिया विमेंशिया कुछ नहीं है, तुम्हारी माँ बिलकुल ठीक-ठाक हैं. तुम्हारा माँ के साथ सलूक गलत है.

इस उकसाने के कारण माँ मुझसे नाराज़ रहने लगीं. एक दिन मौका पा कर घर से फिर निकल गयीं, इस इरादे से कि वे अकेली बाजार जायेंगी. निकलने के बाद वे कुछ घबरा गयीं. सीढ़ियों के पास एक लड़का खड़ा था, उन्होंने उससे कहा कि उन्हें नीचे जाना है. लड़के ने उनकी मदद कर दी. फिर उन्होंने एक रिक्शा वाले को संकेत किया और कहा उन्हें बाजार जाना है. मुझे यह सब मालूम नहीं था. मैंने जब देखा माँ कमरे में नहीं हैं, तो ढूंढ़ना शुरू किया. यह तो शुक्र है कि एक जान-पहचान वाले ने देखा कि माँ अकेली हैं और घबराई हुई लग रही हैं, और उन्हें वापस ले आया, वरना तो यह सोच के दिल दहलता है कि क्या हो सकता था.

इस हादसे के बाद भी माँ के हमउम्र दोस्त यह मानने को तैयार नहीं थे कि माँ को कोई ऐसी तकलीफ थी जिससे उन्हें कंफ्यूशन रहता था, और उनकी सलाह माँ के लिए अनुचित थी. उनका उकसाना जारी रहा.

आखिरकार मैंने माँ के लिए दिन भर साथ रहने वाली एक आया को रखा, जो उनको साथ भी देती थी और यह भी ध्यान रख पाती थी कि माँ खुद को नुकसान न पहुचाएं. मैंने अन्य भी कुछ तरीके अपनाए जिनसे उनके भटकने की प्रवृत्ति कुछ कम हुई. यदि वे कंफ्यूशन के मारे बाहर निकलने की कोशिश करती तो भी हम उन्हें समय पर रोक पाते थे.

डिमेंशिया में भटकने की समस्या आम है, और अधिकाँश डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति में पायी जाती है. इस कारण मैंने इस विषय पर अपने सुझाव एक वीडियो में रिकार्ड करे हैं. शायद यह वीडियो आपके या आपके किसी जान-पहचान वाले के काम आये:

(यदि वीडियो प्लेयर नीचे लोड नहीं होता, तो आप इसे यूट्यूब पर यहाँ देख सकते हैं.

Looking after someone with dementia डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल: एक सरल, संक्षिप्त परिचय

जब परिवार में किसी को डिमेंशिया हो जाता है, तब व्यक्ति का व्यवहार बदल सकता है, व्यक्तित्व बदल सकता है, और काम करने की क्षमता भी बदलने लगती है. यादाश्त पर असर हो सकता है, समय और स्थान का बोध शायद ठीक न रहे. अन्य लक्षण भी पेश हो सकते हैं. इन सबसे व्यक्ति के दैनिक जीवन में दिक्कत होने लगती है. इस सबको देखकर परिवार वाले घबराने लगते हैं. उन्हें समझ में नहीं आता कि वे स्थिति से कैसे जूझें, और व्यक्ति की सहायता कैसे करें.

वैसे तो डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल करने के लिए बहुत कुछ सीखना और बदलना होता है, पर इतना सब कुछ कैसे सीखें, कैसे करें, यह सोच कर भी घबराहट होने लगती है.

कुछ महीने पहले मैंने डिमेंशिया देखभाल का एक सरल परिचय slideshare.net पर अपलोड करा है. यह एक संक्षिप्त विवरण है. नोट देखने के लिए आप इसे सीधे slideshare.net पर देख सकते हैं–क्लिक करें: डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल आप इसे नीचे दिए प्लयेर में भी देख सकते हैं.

देखभाल के तरीकों पर अधिक जानने के लिए आप मेरे वेबसाइट के पृष्ठ देख सकते हैं. वेबसाइट पर देखभाल के सब पहलूओं पर जानकारी और चर्चा है, जैसे कि देखभाल का रोल क्या है, व्यक्ति के लिए घर कैसे बदलें, व्यक्ति से बातचीत कैसे करें, उनकी मदद कैसे करें, वगैरह.

वेबसाइट के लिए यहाँ क्लिक करें

वेबसाइट के देखभाल संबंधी पृष्ठों के लिए क्लिक करें: देखभाल करने वालों के लिए (Caring for dementia patients)

Hindi video: Caregiving for my mother डिमेंशिया से ग्रस्त माँ की देखभाल: मेरे अनुभव (वीडियो)

डिमेंशिया के कारण मेरी माँ को अनेक प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ा और उन्हें सहायता की जरूरत होती थी. देखभाल का सिलसिला कई साल चला. हाल में मैंने माँ के डिमेंशिया के सफर और उनकी देखभाल पर दो हिंदी वीडियो बनाए थे. माँ के डिमेंशिया के सफर वाले वीडियो के बारे में तो मैं पहले एक पोस्ट लिख चुकी हूँ. इस पोस्ट में देखें मेरे देखभाल संबंधी अनुभव पर एक वीडियो:

(प्लेयर ठीक से न चले तो आप वीडियो सीधे यूट्यूब पर देख सकते हैं, यहाँ क्लिक करें: Caregiving for my mother (डिमेंशिया से ग्रस्त माँ की देखभाल: मेरे अनुभव))

मेरे अंग्रेज़ी ब्लॉग पर इस विषय पर पोस्ट देखना चाहें तो लिंक नीचे हैं:

अंग्रेज़ी ब्लॉग: click here for my English blog

माँ के डिमेंशिया और संबंधित देखभाल के मेरे अनुभव पर लिखे मेरे ब्लॉग पोस्ट अनेक श्रेणियों में हैं. इन श्रेणियों के लिंक: Dementia Diagnosis, Living with dementia, Challenging Behavior, People around us, Adapting home and life, और Late stage care.

Dementia and wandering डिमेंशिया और भटकने की समस्या

एक पिछली पोस्ट में डिमेंशिया और भटकने की समस्या का जिक्र करा था. अक्सर परिवार वालों को लक्षणों की गंभीरता का एहसास तब होता है जब व्यक्ति भटक जाते हैं और घर कहाँ है, यह उन्हें याद नहीं होता. वे पूछने वालों को अपना नाम और पता भी ठीक से नहीं पता पाते. किस्मत अच्छी हो तो कोई उन्हें पहचान लेता है और घर ले आता है, पर कभी कभी व्यक्ति कई घंटे या दिन लापता रहते हैं. कभी कभी वे बहुत ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलते, वे कभी वापस नहीं आते..

भटकना डिमेंशिया में एक आम समस्या है. माँ की देखभाल करते हुए मेरे भी ऐसे कई अनुभव थे जिनमें मैं कोशिश करती रही कि माँ के भटकने को कैसे रोकूं. भटकना रोकने के लिए कई सुझाव जोड़ कर कुछ साल पहले मैंने इस विषय पर एक वीडियो भी बनाया.

(यदि वीडियो प्लेयर नीचे लोड नहीं होता, तो आप इसे यूट्यूब पर यहाँ देख सकते हैं.